भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

तुणकी मेखलाको तीन लड़ीवाली करके एक, तीन अथवा पाँच ग्रन्थियाँ उसमें लगानी चाहिये। ब्राह्मण कपासके सूतका, क्षत्रिय सनके सूतका और वैश्य भेड़के ऊनका यज्ञोपवीत धारण करे। ब्राह्मण बिल्व, पलाश या प्लक्षका दण्ड, जो सिरपर्यन्त हो उसे धारण करे। क्षत्रिय बड़, खदिर या बेंतके काष्ठका मस्तकपर्यन्त ऊँचा और वैश्य पैलव (पीलू वृक्षकी लकड़ी), गूलर अथवा पीपलके काष्ठका दण्ड नासिकापर्यन्त ऊँचा धारण करे। ये दण्ड सीधे, छिद्ररहित और सुन्दर होने चाहिये। यज्ञोपवीत-संस्कारमें अपना-अपना दण्ड धारणकर भगवान् सूर्यनारायणका उपस्थान करे और गुरुकी पूजा करे तथा नियमके अनुसार सर्वप्रथम माता, बहिन या मौसीसे भिक्षा माँगे। भिक्षा माँगते समय उपनीत ब्राह्मण वटु भिक्षा देनेवालीसे 'भवति! भिक्षां मे देहि', क्षत्रिय 'भिक्षां भवति! मे देहि' तथा वैश्य 'भिक्षां देहि मे भवति!'—इस प्रकारसे 'भवति' शब्दका प्रयोग करे। भिक्षामें वे सुवर्ण, चाँदी अथवा अन्न ब्रह्मचारीको दें। इस प्रकार भिक्षा ग्रहणकर ब्रह्मचारी उसे गुरुको निवेदित कर दे और गुरुकी आज्ञा पाकर पूर्वाभिमुख हो आचमन कर भोजन करे। पूर्वकी ओर मुख करके भोजन करनेसे आयु, दक्षिण-मुख करनेसे यश, पश्चिम-मुख करनेसे लक्ष्मी और उत्तर-मुख करके भोजन करनेसे सत्यकी अभिवृद्धि होती है। एकाग्रचित्त हो उत्तम अन्नका भोजन करनेके अनन्तर आचमन कर अङ्गों (आँख, कान, नाक)-का जलसे स्पर्श करे। अन्नकी नित्य स्तुति करनी चाहिये और अन्नकी निन्दा किये बिना भोजन करना चाहिये। उसका दर्शन कर संतुष्ट एवं प्रसन्न होना चाहिये। हर्षसे भोजन करना

चाहिये। पूजित अन्नके भोजनसे बल और तेजकी वृद्धि होती है और निन्दित अन्नके भोजनसे बल और तेज दोनोंकी हानि होती है*। इसीलिये सर्वदा उत्तम अन्नका भोजन करना चाहिये। उच्छिष्ट (जूठा) किसीको नहीं देना चाहिये तथा स्वयं भी किसीका उच्छिष्ट नहीं खाना चाहिये। भोजन करके जिस अन्नको छोड़ दे उसे फिर ग्रहण न करे अर्थात् बार-बार छोड़-छोड़कर भोजन न करे, एक बार बैठकर तृप्तिपूर्वक भोजन कर लेना चाहिये। जो पुरुष बीच-बीचमें विच्छेद करके लोभवश भोजन करता है, उसके दोनों लोक नष्ट हो जाते हैं, जैसे धनवर्धन वैश्यके हुए थे।

राजा शतानीकने पूछा— महाराज! आप धनवर्धन वैश्यकी कथा सुनाइये। उसने कैसा भोजन किया और उसका क्या परिणाम हुआ?

सुमन्तु मुनिने कहा— राजन्! सत्ययुगकी बात है, पुष्करक्षेत्रमें धन-धान्यसे सम्पन्न धनवर्धन नामक एक वैश्य रहता था। एक दिन वह ग्रीष्म-ऋतुमें मध्याह्नके समय वैश्वदेव-कर्म सम्पन्न कर अपने पुत्र, मित्र तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ भोजन कर रहा था। इतनेमें ही अकस्मात् उसे बाहरसे एक करुण शब्द सुनायी पड़ा। उस शब्दको सुनते ही वह दयावश भोजनको छोड़कर बाहरकी ओर दौड़ा। किंतु जबतक वह बाहर पहुँचा वह आवाज बंद हो गयी। फिर लौटकर उस वैश्यने पात्रमें जो छोड़ा हुआ भोजन था उसे खा लिया। भोजन करते ही उस वैश्यकी मृत्यु हो गयी और इसी अपराधवश परलोकमें भी उसकी दुर्गति हुई। इसलिये छोड़े हुए भोजनको फिर कभी नहीं खाना चाहिये। अधिक भोजन भी नहीं करना चाहिये। इससे शरीरमें

  • तथात्रं पूजयेन्नित्यमद्याञ्चेतदकुत्सयन्। दर्शनात् तस्य हृष्येद् वै प्रसीदेचापि भारत ॥ पूजितं त्वशनं नित्यं बलमोजश्च यच्छति ॥ अपूजितं तु तदभुकमुभयं नाशयेदितम्। (ब्राह्मपर्व ३।३७—३९)

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