भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

रुद्र प्रसन्न होते हैं। शिखाके स्पर्शसे ऋषिगण, दोनों आँखोंके स्पर्शसे सूर्य, नासिकाके स्पर्शसे वायु, कानोंके स्पर्शसे दिशाएँ, भुजाके स्पर्शसे यम, कुबेर, वरुण, इन्द्र तथा अग्निदेव तृप्त होते हैं। नाभि और प्राणोंकी ग्रन्थियोंके स्पर्श करनेसे सभी तृप्त हो जाते हैं। पैर धोनेसे विष्णुभगवान्, भूमिमें जल छोड़नेसे वासुकि आदि नाग तथा बीचमें जो जलबिन्दु गिरते हैं, उनसे चार प्रकारके भूतग्रामकी तृप्ति होती है।

अङ्गुष्ठ और तर्जनीसे नेत्र, अङ्गुष्ठ तथा अनामिकासे नासिका, अङ्गुष्ठ एवं मध्यमासे मुख, अङ्गुष्ठ और कनिष्ठकासे कान, सब अङ्गुलियोंसे भुजाओंका, अङ्गुष्ठसे नाभिमण्डल तथा सभी अङ्गुलियोंसे सिरका स्पर्श करना चाहिये। अङ्गुष्ठ अग्रिर्पुष्प है, तर्जनी वायुरूप, मध्यमा प्रजापतिरूप, अनामिका सूर्यरूप और कनिष्ठिका इन्द्ररूप है१।

इस विधिसे ब्राह्मणके आचमन करनेपर सम्पूर्ण जगत्, देवता और लोक तृप्त हो जाते हैं। ब्राह्मण सदा पूजनीय है, क्योंकि वह सर्वदेवमय है।

ब्राह्मतीर्थ, प्राजापत्यतीर्थ अथवा देवतीर्थसे आचमन करे, परंतु पितृतीर्थसे कभी भी आचमन नहीं करना चाहिये। आचमनका जल हृदयतक

जानेसे ब्राह्मणकी, कण्ठतक जानेसे क्षत्रियकी और वैश्यकी जलके प्राशनसे तथा शूद्रकी जलके स्पर्शमात्रसे शुद्धि हो जाती है।

दाहिने हाथके नीचे और बायें कंधेपर यज्ञोपवीत रहनेसे द्विज उपवीती (सव्य) कहलाता है, इसके विलोम रहनेसे अर्थात् यज्ञोपवीतके दाहिने कंधेसे बायों ओर रहनेसे प्राचीनावीती (अपसव्य) तथा गलेमें मालाकी तरह यज्ञोपवीत रहनेसे निवीती कहा जाता है।

मेखला, मृगछाला, दण्ड, यज्ञोपवीत और कमण्डलु—इनमें कोई भी चीज भग्न हो जाय तो उसे जलमें विसर्जित कर मन्त्रोच्चारणपूर्वक दूसरा धारण करना चाहिये। उपवीती (सव्य) होकर और दाहिने हाथको जानु अर्थात् घुटनेके भीतर रखकर जो ब्राह्मण आचमन करता है वह पवित्र हो जाता है। ब्राह्मणके हाथकी रेखाओंको गङ्गा आदि नदियोंके समान पवित्र समझना चाहिये और अङ्गुलियोंके जो पर्व हैं, वे हिमालय आदि देवपर्वत माने जाते हैं। इसलिये ब्राह्मणका दाहिना हाथ सर्वदेवमय है और इस विधिसे आचमन करनेवाला अन्तमें स्वर्गलोकको प्राप्त करता है२। (अध्याय ३)

वेदाध्ययन-विधि, ओंकार तथा गायत्री-माहात्म्य, आचार्यादि-लक्षण,

ब्रह्मचारिधर्म-निरूपण, अभिवादन-विधि, स्नातककी महिमामें

अङ्गिरापुरका आख्यान, माता-पिता और गुरुकी महिमा

सुमन्तु मुनिने कहा—राजन्! ब्राह्मणका केशान्त (समावर्तन)-संस्कार सोलहवें वर्षमें, क्षत्रियका बार्हस्यवर्षमें तथा वैश्यका पचीसवें वर्षमें करना चाहिये। स्त्रियोंके संस्कार अमन्त्रक करने चाहिये।

केशान्त-संस्कार होनेके अनन्तर चाहे तो गुरु-गृहमें रहे अथवा अपने घरमें आकर विवाह कर अग्निहोत्र ग्रहण करे। स्त्रियोंके लिये मुख्य संस्कार विवाह है।

१- अङ्गुष्ठोऽग्रिमहाबाहो प्रोक्तो वायुः प्रदेशिनी ॥

अनामिका तथा सूर्यः कनिष्ठा मघवा विभो। प्रजापतिर्मध्यमा ज्ञेया तस्माद् भरतसप्तम ॥ (ब्राह्मपर्व ३।८४-८५)

२- यास्त्वैताः करमध्ये तु रेखा विप्रस्य भारत ॥

गङ्गाद्याः सरितः सर्वा ज्ञेया भरतसप्तम। यान्यङ्गुलिषु पर्वाणि गिरयस्तानि विद्धि वै ॥

सर्वदेवमयो राजन् करो विप्रस्य दक्षिणः।

(ब्राह्मपर्व ३।१२-१४)

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