भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
क्योंकि विधिपूर्वक वन्दन करनेसे ही सभी तीर्थोंका फल प्राप्त हो जाता है। स्वर्ग और अपवर्ग-रूपी फलको प्रदान करनेवाले एक आद्य ब्रह्मस्वरूप पिताको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनकी प्रसन्नतासे संसार सुन्दररूपमें दिखायी देता है, उन पिताका मैं तिलयुक्त जलसे तर्पण करता हूँ। पिता ही जन्म देता है, पिता ही पालन करता है, पितृगुण ब्रह्मस्वरूप हैं, उन्हें नित्य पुनः-पुनः नमस्कार है। हे पितः ! आपके अनुग्रहसे लोकधर्म प्रवर्तित होता है, आप साक्षात् ब्रह्मरूप हैं, आपको नमस्कार है।
जो अपने उदररूपी विवरमें रखकर स्वयं उसकी सभी प्रकारसे रक्षा करती है, उस परा प्रकृतिस्वरूपा जननीदेवीको नमस्कार है। मातः ! आपने बड़े कष्टसे मुझे अपने उदर-प्रदेशमें धारण किया, आपके अनुग्रहसे मुझे यह संसार देखनेको मिला, आपको बार-बार नमस्कार है। पृथिवीपर जितने तीर्थ और सागर आदि हैं उन सबकी स्वरूपभूता आपको अपनी कल्याण-प्राप्तिके लिये मैं नमस्कार करता हूँ। जिन गुरुदेवके प्रसादसे मैं यशस्करी विद्या प्राप्त की है,
उन भवसागरके सेतुस्वरूप शिवरूप गुरुदेवको मेरा नमस्कार है। अग्रजन्मन् ! वेद और वेदाङ्ग-शास्त्रोंके तत्त्व आपमें प्रतिष्ठित हैं। आप सभी प्राणियोंके आधार हैं, आपको मेरा नमस्कार है। ब्राह्मण सम्पूर्ण संसारके चलते-फिरते परम पावन तीर्थस्वरूप हैं। अतः हे विष्णुरूपी भूदेव ! आप मेरा पाप नष्ट करें, आपको मेरा नमस्कार है।
द्विजो ! जैसे पिता श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार पिताके बड़े-छोटे भाई और अपने बड़े भाई भी पिताके समान ही मान्य एवं पूज्य हैं। आचार्य ब्रह्माकी, पिता प्रजापतिकी, माता पृथ्वीकी और भाई अपनी ही मूर्ति हैं। पिता मेरुस्वरूप एवं वसिष्ठ-स्वरूप सनातन धर्ममूर्ति हैं। ये ही प्रत्यक्ष देवता हैं, अतः इनकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसी प्रकार पितामह एवं पितामही (दादा-दादी)-के भी पूजन-वन्दन, रक्षण, पालन और सेवनकी अत्यन्त महिमा है। इनकी सेवाके पुण्योंकी तुलनामें कोई नहीं है, क्योंकि ये माता-पिताके भी परम पूज्य हैं। (अध्याय ६)
पुराण-श्रवणकी विधि तथा पुराण-वाचककी महिमा
श्रीसूतजी बोले—ब्राह्मणो ! पूर्वकालमें महातेजस्वी ब्रह्माजीने पुराण-श्रवणकी जिस विधिको मुझसे कहा था, उसे मैं आपको सुना रहा हूँ, आप सुनें। इतिहास-पुराणोंके भक्तिपूर्वक सुननेसे ब्रह्महत्या
आदि सभी पापोंसे मुक्ति हो जाती है, जो प्रातः-सायं तथा रात्रिमें पवित्र होकर पुराणोंका श्रवण करता है, उसपर ब्रह्मा, विष्णु और शंकर संतुष्ट हो जाते हैं*। प्रातःकाल इसके पढ़ने और सुननेवालेसे
या कुक्षिविरे कृत्वा स्वयं रक्षति सर्वतः । नमामि जननीं देवीं परां प्रकृतिरूपिणीम् ॥ कुच्छेण महता देव्या धारितोऽहं यथोदरे । त्वत्प्रसादाज्जगददृष्टं मातरित्यं नमोऽस्तु ते ॥ पृथिव्यां यानि तीर्थानि सागरादीनि सर्वशः । वसन्ति यत्र तां नौमि मातरं भूतिहेतवे ॥ गुरुदेवप्रसादेन लब्धा विद्यायशस्करी । शिवरूपं नमस्तस्मै संसारार्णवसेतवे ॥ वेदवेदाङ्गशास्त्राणां तत्त्वं यत्र प्रतिष्ठितम् । आधारः सर्वभूतानामग्रजन्मन् नमोऽस्तु ते ॥ ब्राह्मणो जगतां तीर्थं पावनं परमं यतः । भूदेव हर मे पापं विष्णुरूपिन् नमोऽस्तु ते ॥
(मध्यमपर्व १।६।६-१४)
- इतिहासपुराणानि श्रुत्वा भक्त्याद्विजोत्तमाः । मुच्यते सर्वपापेभ्यो ब्रह्महत्याशतं च यत् ॥
सायं प्रातस्तथा राज्ञो शुचिर्भूत्वा शृणोतियः । तस्य विष्णुस्तथा ब्रह्मा तुष्ट्यते शङ्करस्तथा ॥
(मध्यमपर्व १।७।३-४)
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