भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • मध्यमपर्व, द्वितीय भाग *

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हैं। पितरों और वैश्वानरसे युक्त हैं तथा कुटिल भूसे सुशोभित हैं। उनका मुख भयंकर है। हाथ जानुपर्यन्त लम्बे हैं१। ऐसे वास्तुपुरुषका विधिके अनुसार पूजन कर उन्हें स्नान कराये। 'वास्तोष्पते' यह वास्तुदेवताके पूजनका मुख्य मन्त्र है२। पूजाकी जितनी सामग्री है, उसे प्रोक्षणद्वारा शुद्ध कर ले। आसनकी शुद्धि कर गणेश, सूर्य, इन्द्र और आधारशक्तिरूप पृथ्वी तथा ब्रह्माका पूजन करे। तदनन्तर हाथमें श्वेत चन्दनयुक्त श्वेत पुष्प लेकर विष्णुरूप वास्तुपुरुषका ध्यान कर उन्हें आसन, पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क आदि प्रदान करे और विविध उपचारोंसे उनकी पूजा करे।

विद्वान् ब्राह्मणको चाहिये कि कुण्ड और वास्तुदेवीके मध्यमें कलशकी स्थापना करे। कलशमें पर्वतके शिखर, गजशाला, वल्मीक, नदीसंगम, राजद्वार, चौराहे तथा कुशके मूलकी—यह सात प्रकारकी मिट्टी छोड़े। साथ ही उसमें इन्द्रवल्ली (पारिजात), विष्णुकान्ता (कृष्ण शङ्खुपुष्पी), अमृती (आमलकी), त्रपुष (खीरा), मालती, चम्पक

तथा ऊर्वारुक (ककड़ी)—इन वनस्पतियोंको छोड़े। पारिभद्र (नीम)-के पत्रोंसे कलशके कण्ठका परिवेष्टन करे और कलशके मुखमें फणाकाररूपमें पञ्चपल्लवोंकी स्थापना करे। उसके ऊपर श्रीफल, बीजपूर, नारिकेल, दाड़िम, धात्री तथा जम्बूफल रखे। कलशमें सुवर्णादि पञ्चरत्न छोड़े। गन्ध-पुष्पादि पञ्चोपचारोंसे कलशका पूजन करे। कलशमें वरुणका आवाहन करे। कलशका स्पर्श करते हुए उसमें समस्त समुद्रों, तीर्थों, गङ्गादि नदियों तथा पवित्र जलाशयों आदिके पवित्र जलकी भावना कर, उनका आवाहन करे। कलश-स्थापनके अनन्तर तिल, चावल, मध्वाज्य तथा दही, दूध आदिसे यथाविधि वास्तु-होम करे। वास्तु-हवनके समय वास्तु-देवताके मन्त्रका जप करे। अनन्तर वास्तु-मण्डलके समस्त देवताओंको पायसात्र, कृशरात्र आदि पृथक्-पृथक् क्रमशः बलि निवेदित करे। सभी देवताओंको उन्हींके अनुरूप पताका भी प्रदान करे। अपनी सामर्थ्यके अनुसार मन्त्र-जप और वास्तुपुरुषस्तवका पाठ करे३। भगवान्

१-श्वेतं चतुर्भुजं शान्तं कुण्डलाधैरलंकृतम्। पुस्तकं चाक्षमालां च वराभयकरं परम्॥

पितृवैश्वानरोपेतं कुटिलभूपशोभितम्। करालवदनं चैव आजानुकरलम्बितम्॥ (मध्यमपर्व २।११।११-१२)

२-पूरा मन्त्र इस प्रकार है—

वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्तस्वावेशो अनभीवो भवानः। यत् त्वेमेहे प्रति तन्नो जुपस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥

(ऋ७।५४।१)

हे वास्तुदेव! हम आपके सच्चे उपासक हैं, इसपर आप पूर्ण विश्वास करें और हमारी स्तुति-प्रार्थनाओंको सुनकर हम सभी उपासकोंको आधि-व्याधिमुक्त कर दें तथा जो हम अपने धन-श्रेयर्थकी कामना करते हैं, आप उसे भी परिपूर्ण कर दें, साथ ही इस वास्तुक्षेत्र या गृहमें निवास करनेवाले हमारे स्त्री-पुत्रादि-परिवार-परिजनोंके लिये कल्याणकारक हों एवं हमारे अधीनस्थ गौ, अश्वदि सभी चतुष्पद प्राणियोंका भी कल्याण करें।

३-भगवान् शंकरके द्वारा की गयी 'ब्रह्मस्तव' नामकी विष्णु-स्तुति इस प्रकार है—

विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्ज्यो यज्ञियो यज्ञपालकः। नारायणो नरो हंसो विष्वक्सेनो हुताशनः॥

यज्ञेशः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः। आदिदेवो जगत्कर्ता मण्डलेशो महीधरः॥

पद्मनाभो हृषीकेशो दाता दामोदरो हरिः। त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो ब्रह्मणः प्रीतिवर्धनः॥

भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यवाक्यो ध्रुवः शुचिः। संन्यासी शास्त्रतत्त्वज्ञस्त्रिपञ्चाशदगुणात्मकः॥

विदारी विनयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतप्रभः। यज्ञस्त्वं हि वषट्कारस्त्वमंकारस्त्वमन्यः॥

त्वं स्वधा त्वं हि स्वाहा त्वं सुधा च पुरुषोत्तमः।

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