भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
हवन करना चाहिये। अग्निकी सात जिह्वाएँ कही गयी हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं—(१) हिरण्या, (२) कनका, (३) रक्ता, (४) आरक्ता, (५) सुप्रभा,
(६) बहुरूपा तथा (७) सती। इन जिह्वा-देवियोंके ध्यान करनेसे सम्पूर्ण फलकी प्राप्ति होती है।
(अध्याय १४—१६)
अधिवासनकर्म एवं यज्ञकर्ममें उपयोग्य उत्तम ब्राह्मण तथा धर्मदेवताका स्वरूप
सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! देव-प्रतिष्ठाके पहले दिन देवताओंका अधिवासन करना चाहिये और विधिके अनुसार अधिवासनके पदार्थ—धान्य आदिकी प्रतिष्ठा कर यूप आदिको भी स्थापित कर लेना चाहिये। कलशके ऊपर गणेशजीकी स्थापना कर दिक्पाल और ग्रहोंका पूजन करना चाहिये। तड़ाग तथा उद्यानकी प्रतिष्ठामें प्रधानरूपसे ब्रह्माकी, शान्ति-यागमें तथा प्रपायागमें वरुणकी, शैव-प्रतिष्ठामें शिवकी और सोम, सूर्य तथा विष्णु एवं अन्य देवताओंका भी पाद्य-अर्घ्य आदिसे अर्चन करना चाहिये। 'द्वुपदादिव' (यजु० २०।२०) इस मन्त्रसे पहले प्रतिमाको स्नान कराये। स्नानके अनन्तर मन्त्रोंद्वारा गन्ध, फूल, फल, दूर्वा, सिंदूर, चन्दन, सुगन्धित तैल, पुष्प, धूप, दीप, अक्षत, वस्त्र आदि उपचारोंसे पूजन करे। मण्डपके अंदर प्रधान देवताका आवाहन करे और उसीमें अधिवासन करे। सुरक्षा-कर्मियोंद्वारा उस स्थानकी सुरक्षा करवाये। तदनन्तर आचार्य, यजमान और ऋत्विक् मधुर पदार्थोंका भोजन करें। बिना अधिवासन-कर्म सम्पन्न किये देव प्रतिष्ठाका कोई फल नहीं होता। नित्य, नैमित्तिक, अथवा काम्य कर्मोंमें विधिके अनुसार कुण्ड-मण्डपकी रचना कर हवनकार्य करना चाहिये।
ब्राह्मणो! यज्ञकार्यमें अनुष्ठानके प्रमाणसे आठ होता, आठ द्वारपाल और आठ याजक ब्राह्मण होने चाहिये। ये सभी ब्राह्मण शुद्ध, पवित्र तथा उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न वेदमन्त्रोंमें पारङ्गत होने चाहिये। एक जप करनेवाले जापकका भी वरण करना चाहिये। ब्राह्मणोंकी गन्ध, माल्य, वस्त्र तथा
दक्षिणा आदिके द्वारा विधिके अनुसार पूजा करनी चाहिये। उत्तम सर्वलक्षणसम्पन्न तथा विद्वान् ब्राह्मण न मिलनेपर किये गये यज्ञका उत्तम फल प्राप्त नहीं होता। ब्राह्मण वरणके समय गोत्र और नामका निर्देश करे। तुलापुरुषके दानमें, स्वर्णपर्वतके दानमें, वृषोत्सर्गमें एवं कन्यादानमें गोत्रके साथ प्रवरका भी उच्चारण करना चाहिये। मृत भार्यावाला, कृपण, शूद्रके घरमें निवास करनेवाला, बौना, वृषलीपति, बन्धुद्वेषी, गुरुद्वेषी, स्त्रीद्वेषी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग, भग्नदन्त, दाम्भिक, प्रतिग्राही, कुनखी, व्यभिचारी, कुष्ठी, निद्रालु, व्यसनी, अदीक्षित, महाव्रणी, अपुत्र तथा केवल अपना ही भरण-पोषण करनेवाला—ये सब यज्ञके पात्र नहीं हैं। ब्राह्मणोंके वरण एवं पूजनके मन्त्रोंके भाव इस प्रकार हैं—आचार्यदेव! आप ब्रह्मकी मूर्ति हैं। इस संसारसे मेरी रक्षा करें। गुरो! आपके प्रसादसे ही यह यज्ञ करनेका सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ है। चिरकालतक मेरी कीर्ति बनी रहे। आप मुझपर प्रसन्न होवें, जिससे मैं यह कार्य सिद्ध कर सकूँ। आप सब भूतोंके आदि हैं, संसाररूपी समुद्रसे पार करानेवाले हैं। ज्ञानरूपी अमृतके आप आचार्य हैं। आप यजुर्वेदस्वरूप हैं, आपको नमस्कार हैं। ऋत्विग्गणो! आप षडङ्ग वेदोंके ज्ञाता हैं, आप हमारे लिये मोक्षप्रद हों। मण्डलमें प्रवेश करके उन ब्राह्मणोंको अपने-अपने स्थानोंपर क्रमशः आदरसे बैठाये। वेदीके पश्चिम भागमें आचार्यको बैठाये, कुण्डके अग्र-भागमें ब्रह्माको बैठाये। होता, द्वारपाल आदिको भी यथास्थान आसन दे। यजमान उन आचार्य आदिको सम्बोधित कर प्रार्थना करे कि
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