भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करे। भेरी आदिके मङ्गलमय वाद्योंके साथ मण्डपमें षोडशाक्षर 'हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।' आदि मन्त्र लिखे एवं इन्द्रादि दिकपाल देवताओं तथा उनके आयुधों आदिका भी यथास्थान चित्रण करे। फिर आचार्य और ब्रह्माका वरण करे। वरणके अनन्तर आचार्य तथा ब्रह्मा यजमानसे प्रसन्न हो उसके सर्वविध कल्याणकी कामना करके 'स्वस्ति' ऐसा कहे। अनन्तर सपत्नीक यजमानको सर्वौषधियोंसे 'आपो हि घ्ना' (यजु० ११।५०) इस मन्त्रद्वारा ब्रह्मा, ऋत्विक् आदि स्नान करायें। यव, गोधूम, नीवार, तिल, साँवा, शालि, प्रियंगु और व्रीहि—ये आठ सर्वौषधि कहे गये हैं। आचार्यादिद्वारा अनुज्ञात सपत्नीक यजमान शुक्ल वस्त्र तथा चन्दन आदि धारणकर पुरोहितको आगेकर मङ्गल-घोषके साथ पुत्र-पौत्रादिसहित पश्चिमद्वारसे यज्ञ-मण्डपमें प्रवेश करे। वहाँ वेदीकी प्रदक्षिणा कर नमस्कार करे। ब्राह्मणकी आज्ञाके अनुसार यजमान निश्चित आसनपर बैठे। ब्राह्मणलोग स्वस्तिवाचन करें। अनन्तर यजमान पाँच देवोंका पूजन करे। फिर सरसों आदिसे विघ्नकर्ता भूतोंका अपसर्पण कराये। यजमान अपने बैठनेके आसनका पुष्प-चन्दनसे अर्चन करे। अनन्तर भूमिका हाथसे स्पर्शकर इस प्रकार कहे—'पृथ्वीमाता! तुमने लोकोंको धारण किया है और तुम्हें विष्णुने धारण किया है। तुम मुझे धारण करो और मेरे आसनको पवित्र करो*।' फिर सूर्यको अर्घ्य देकर गुरुको हाथ जोड़कर प्रणाम करे। हृदयकमलमें इष्ट देवताका ध्यान कर तीन प्राणायाम करे। ईशान दिशामें कलशके ऊपर विघ्नराज गणेशजीकी गन्ध, पुष्प, वस्त्र तथा विविध नैवेद्य आदिसे 'गणानां त्वा' (यजु० २३।१९) मन्त्रसे पूजन करे। अनन्तर 'आ ब्रह्मन्' (यजु० २२।२२) इस मन्त्रसे ब्रह्माजीकी, 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रसे भगवान्
विष्णुकी पूजा करे। फिर वेदीके चारों ओर सभी देवताओंको स्व-स्व स्थानपर स्थापित कर उनका पूजन करे। इसके बाद 'राजाधिराजाय प्रसह्य' इस मन्त्रसे भूशुद्धि कर श्वेत पद्यासनपर विराजमान, शुद्धस्फटिक तथा शङ्खु, कुन्द एवं इन्दुके समान उज्ज्वल वर्ण, किरीट-कुण्डलधारी, श्वेत कमल, श्वेत माला और श्वेत वस्त्रसे अलंकृत, श्वेत गन्धसे अनुलिस, हाथमें पाश लिये हुए, सिद्ध गन्धर्वों तथा देवताओंसे स्तूयमान, नागलोककी शोभारूप, मकर, ग्राह, कूर्म आदि नाना जलचरोंसे आवृत, जलशायी भगवान् वरुणदेवका ध्यान करे। ध्यानके अनन्तर पञ्चाङ्गन्यास कर मूलमन्त्रका जप करे तथा उस जलसे आसन, यज्ञ-सामग्री आदिका प्रोक्षण करे। फिर भगवान् सूर्यको अर्घ्य दे। अनन्तर ईशानकोणमें भगवान् गणेश, अग्निकोणमें गुरुपादुका तथा अन्य देवताओंका यथाक्रम पूजन करे। मण्डलके मध्यमें शक्ति, सागर, अनन्त, पृथ्वी, आधारशक्ति, कूर्म, सुमेरु तथा मन्दर और पञ्चतत्त्वोंका साङ्गोपाङ्ग पूजन करे। पूर्व दिशामें कलशके ऊपर श्वेत अक्षत और पुष्प लेकर भगवान् वरुणदेवका आवाहन करे। वरुणको आठ मुद्रा दिखाये। गायत्रीसे स्नान कराये तथा पाद्य, अर्घ्य, पुष्पाञ्जलि आदि उपचारोंसे वरुणका पूजन करे। ग्रहों, लोकपालों, दस दिकपालों तथा पीठपर ब्रह्मा, शिव, गणेश और पृथ्वीका गन्ध, चन्दन आदिसे पूजन करे। पीठके ईशानादि कोणोंमें कमला, अम्बिका, विश्वकर्मा, सरस्वती तथा पूर्वदि द्वारोंमें उनचास मरुद्गणोंका पूजन करे। पीठके बाहर पिशाच, राक्षस, भूत, बेताल आदिकी पूजा करे। कलशपर सूर्यादि नवग्रहोंका आवाहन एवं ध्यानकर पाद्य, अर्घ्य, गन्ध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य तथा बलि आदिद्वारा मन्त्रपूर्वक उनकी पूजा करे और उनकी पताकाएँ उन्हें निवेदित करे।
- पृथिव्यं त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता ॥
त्वं च धारय मां नित्यं पवित्रभासनं कुरु। (मध्यमपर्व २।२०।२३-२४)
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