भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 654 में से

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पृष्ठ 279

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥

मध्यमपर्व

(तृतीय भाग) उद्यान-प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! उद्यान आदिकी प्रतिष्ठामें जो कुछ विशेष विधि है, अब उसे बता रहा हूँ, आपलोग सुनें। सर्वप्रथम एक चौकोर मण्डलकी रचना कर उसपर अष्टदल कमल बनाये। मण्डलके ईशानकोणमें कलशकी स्थापना कर उसपर भगवान् गणनाथ और वरुणदेवकी पूजा करे। तदनन्तर मध्यम कलशमें सूर्यादि ग्रहोंका पूजन करे। फिर पश्चिमादि द्वारदेशोंमें ब्रह्मा और अनन्त तथा मध्यमें वरुणकी पूजा करे। जलपूरित कलशमें भगवान् वरुणका आवाहन करते हुए कहे—‘वरुणदेव! मैं आपका आवाहन करता हूँ। विभो! आप हमें स्वर्ग प्रदान करें।’ तदनन्तर पूर्वभागमें मन्दरगिरिकी स्थापना कर तोरणपर विष्वक्सेनकी पूजा करे और कर्णिका-देशमें भगवान् वासुदेवका पूजन करे। भगवान् वासुदेव शुद्ध स्फटिकके सदृश हैं। वे अपने चारों हाथोंमें शङ्ख, चक्र, गदा और पद्म धारण किये हुए हैं। उनके वक्षःस्थलपर श्रीवत्स-चिह्न और कौस्तुभमणि सुशोभित है तथा मस्तक सुन्दर मुकुटसे अलंकृत है। उनके दक्षिण भागमें भगवती कमला, वाम भागमें पुष्टिदेवी विराजमान हैं। सुर, असुर, सिद्ध, किन्नर, यक्ष आदि उनकी स्तुति करते हैं। ‘विष्णो रराटः’ (यजु० ५।२१) इस मन्त्रसे भगवान् विष्णुकी पूजा करे। उनके साथमें संकर्वणादि-व्यूह और विमला आदि शक्तियोंकी धूप, दीप आदि उपचारोंसे अर्चना कर प्रार्थना करे। उनके सामने घीका दीप जलाये और गुगुलका धूप प्रदान कर घृतमिश्रित खीरका नैवेद्य लगाये। कर्णिकाके दक्षिणकी ओर कमलके

ऊपर स्थित सोमका ध्यान करे। उनका वर्ण शुक्ल है, वे शान्तस्वरूप हैं, वे अपने हाथोंमें वरद और अभय-मुद्रा धारण किये हैं एवं केयूरादि धारण करनेके कारण अत्यन्त शोभित हैं। ‘इमं देवा’ (यजु० ९।४०) इस मन्त्रसे इनकी पूजा कर इन्हें घृतमिश्रित भातका नैवेद्य अर्पण करे। पूर्व आदि दिशाओंमें इन्द्र, जयन्त, आकाश, वरुण, अग्नि, ईशान, तत्पुरुष तथा वायुकी पूजा करे। कर्णिकाके वाम भागमें शुक्ल वर्णवाले महादेवका ‘ज्यम्बकं’ (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे पूजन कर नैवेद्य आदि प्रदान करे। भगवान् वासुदेवके लिये हविष्यसे आठ, सोमके लिये अट्टाईस तथा शिवके लिये दो खीरकी आहुतियाँ दे। गणेशजीको घीकी एक आहुति दे। ब्रह्मा एवं वरुणके लिये एक-एक आहुति और ग्रहों एवं दिक्पालोंके लिये विहित समिधाओं तथा घीसे एक-एक आहुतियाँ दे।

अग्निकी सात जिह्वाओं—कराली, धूमली, श्वेता, लोहिता, स्वर्णप्रभा, अतिरिक्ता और पद्मरागाको भी मन्त्रोंसे घृत एवं मधुमिश्रित हविष्यद्वारा एक-एक आहुति प्रदान करे। इसी प्रकार अग्नि, सोम, इन्द्र, पृथ्वी और अन्तरिक्षके निमित्त मधु और क्षीरयुक्त यवोंसे एक-एक आहुतियाँ प्रदान करे। फिर गन्ध-पुष्पादिसे उनकी पृथक्-पृथक् पूजा करके रुद्रसूक्त तथा सौरसूक्तका जप करे। अनन्तर यूपको भलीभाँति स्नान कराकर और उसका मार्जन कर उसे उद्यानके मध्य भागमें गाड़ दे। यूपके प्रान्त-भागमें सोम तथा वनस्पतिके लिये ध्वजाओंको लगा दे। ‘कोऽदात्कस्मा’ (यजु० ७।४८) इस

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