भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें* ब्राह्मपर्व * २५
रथ आदि यानपर चढ़े हुए, अतिवृद्ध, रोगी, भारयुक्त, स्त्री, स्नातक (जिसका समावर्तन-संस्कार हो गया हो), राजा और वर (दूल्हा) यदि सामनेसे आते हों तो इन्हें मार्ग पहले देना चाहिये। ये सभी यदि एक साथ आते हों तो स्नातक और राजा मान्य हैं। इन दोनोंमेंसे भी स्नातक विशेष मान्य है१।
जो ब्राह्मण शिष्यका उपनयन कराकर रहस्य (यज्ञ, विद्या और उपनिषद्) तथा कल्पसहित वेदाध्ययन कराता है, उसे आचार्य कहते हैं। जो जीविकाके निमित्त वेदका एक भाग अथवा वेदाङ्ग पढ़ाता है, वह उपाध्याय कहलाता है। जो निषेक अर्थात् गर्भाधानादि संस्कारोंको रीतिसे कराता है और अन्नादिसे पोषण करता है, उस ब्राह्मणको गुरु कहते हैं। जो अग्निष्टोम, अग्निहोत्र, पाक-यज्ञादि कर्मोंका वरण लेकर जिसके निमित्त करता है, वह उसका ऋत्विक् कहलाता है। जो पुरुष वेद-ध्वनिसे दोनों कान भर देता है, उसे माता-पिताके समान समझकर उससे कभी द्वेष नहीं करना चाहिये।
उपाध्यायसे दस गुना गौरव आचार्यका और आचार्यसे सौ गुना पिताका तथा पितासे हजार गुना गौरव माताका होता है—
उपाध्यायान्दशाचार्य आचार्याणां शतं पिता।
<p align="right">(ब्राह्मपर्व ४।७९)</p>
सहस्रेण पितुर्माता गौरवेणातिरिच्यते॥
जन्म देनेवाला और वेद पढ़ानेवाला—ये दोनों पिता हैं, किंतु इनमें भी वेदाध्ययन करानेवाला श्रेष्ठ है, क्योंकि ब्राह्मणका मुख्य जन्म तो वेद पढ़नेसे ही होता है। इसलिये उपाध्याय आदि जितने पूज्य हैं, उनमें सबसे अधिक गौरव महागुरुका ही होता है।
राजा शतानीकने पूछा—हे मुने! आपने उपाध्याय आदिके लक्षण बताये, अब महागुरु किसे कहते हैं? यह भी बतानेकी कृपा करें।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! जो ब्राह्मण जयोपजीवी हो अर्थात् अष्टादशपुराण, रामायण, विष्णुधर्म, शिवधर्म, महाभारत (भगवान् श्रीकृष्ण-द्वैपायन व्यासद्वारा रचित महाभारत जो पञ्चम वेदके नामसे भी विख्यात है) तथा श्रौत एवं स्मार्त-धर्म (विद्वान् लोग इन सभीको ‘जय’ नामसे अभिहित करते हैं)—का ज्ञाता हो, वह महागुरु कहलाता है२। वह सभी वर्णोंके लिये पूज्य है। जो शास्त्रद्वारा थोड़ा या बहुत उपकार करे, उसको भी उस उपकारके बदले गुरु मानना चाहिये। अवस्थामें चाहे छोटा क्यों न हो, पढ़ानेसे वह बालक वृद्धका भी पिता हो सकता है। राजन्! इस विषयमें एक प्राचीन आख्यान सुनो—
पूर्वकालमें अङ्गिरा मुनिके पुत्र बृहस्पति (बालक होनेपर भी) बड़े वृद्धोंको पढ़ाते थे और पढ़ानेके समय ‘हे पुत्रो! पढ़ो’ ऐसा कहते थे। बालकद्वारा ‘पुत्र’ सम्बोधन सुनकर उनको बड़ा क्षोभ हुआ और वे देवताओंके पास गये तथा उन्होंने सारा वृत्तान्त बतलाया। तब देवताओंने कहा—पितृगणो! उस बालकने न्यायोचित बात ही कही है, क्योंकि
१-चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः। स्नातकस्य तु राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च॥
एषां समागमे तात पूज्यौ स्नातकपार्थिवौ। आभ्यां समागमे राजन् स्नातको नृपमानभाक्॥
२-जयोपजीवी यो विप्रः स महागुरुरुच्यते। अष्टादशपुराणानि रामस्य चरितं तथा॥
विष्णुधर्मादयो धर्माः शिवधर्माश्च भारत। कार्ष्णं वेदं पञ्चमं तु यन्महाभारतं स्मृतम्॥
श्रौता धर्माश्च राजेन्द्र नारदोक्ता महीपते। जयेति नाम एतेषां प्रवदन्ति मनीषिणः॥