भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • मध्यमपर्व, तृतीय भाग *

२७५

पुष्पवाटिका तथा तुलसीकी प्रतिष्ठा-विधि

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! पुष्पवाटिकाकी प्रतिष्ठामें तीन हाथकी एक वेदीका निर्माण कर उसपर घटकी स्थापना करे। पुष्पाधिवाससे एक दिन पूर्व ब्राह्मण-भोजन कराये। कलशपर गणेश, सूर्य, सोम, अग्निदेव तथा नारायणका आवाहन कर पूजन करे। वेदीपर मधु तथा पायससे हवन करे। ईशानकोणमें विधिवत् यूपका समारोपण कर उसके मूलमें गुरुवारके दिन गेहूँओंका रोपण कर उन्हें सींचे। वाटिकाको रक्त सूत्रसे आवेष्टित करे। वाटिकाके पुष्प-वृक्षोंका कर्णवेध कराकर उन्हें कुशोदकसे स्नान कराये और ब्राह्मणोंको धान्य, यव और गेहूँ दक्षिणारूपमें प्रदान करे और वाटिकाको जलधारासे सींचे।

तुलसीकी प्रतिष्ठा ज्येष्ठ और आषाढ़ मासमें विधिपूर्वक करनी चाहिये। प्रतिष्ठाके लिये शुद्ध दिन अथवा एकादशी तिथि होनी चाहिये। रात्रिमें घटकी स्थापना कर विष्णु, शिव, सोम, ब्रह्मा तथा इन्द्रका पूजन करे। गायत्री-मन्त्र तथा पूर्वोक्त देवताओंके मन्त्रोंद्वारा उन्हें स्नान कराये। 'कया नक्षित्रः' (यजु० २७।३९) इस मन्त्रसे गन्ध, 'अःशुनाः' (यजु० २०।२७) इस मन्त्रसे इत्र, 'त्वां गन्धर्वाः' (यजु० १२।१८) तथा 'मा नस्तोकेः' (यजु० १६।१६) आदि मन्त्रोंसे पुष्प, 'श्रीश्च तैः' (यजु० ३१।२२) तथा 'वैश्वदेवीः' (यजु० १९।४४) इन मन्त्रोंसे दूर्वा, 'रूपेण वोः' (यजु० ७।४५) इस मन्त्रसे दर्पण और 'याः फलिनीयाः' (यजु० १२।८९) इस मन्त्रसे फल अर्पण करे तथा

'समिन्द्वोः' (यजु० २९।१) इस मन्त्रसे अञ्जन लगाये। तुलसीको पीले सूत्रसे आवेष्टित कर उसके चारों ओर दूध और जलकी धारा दे। कलश तथा तुलसीको वस्त्रसे भलीभाँति आच्छादित कर घर आ जाय। दूसरे दिन 'तद्विष्णोः' (यजु० ६।५) इस मन्त्रसे सुहागिनी स्त्रियोंद्वारा मङ्गल-गानपूर्वक उसे स्नान कराये। मातृ-पूजापूर्वक वृद्धि-श्राद्ध करे। गन्ध आदि पदार्थोंद्वारा आचार्य, होता और ब्रह्मा आदिका वरण करे। दस हाथके मण्डपमें गोलाकार वेदीका निर्माण करे और वहाँ भगवान् नारायणका पूजन करे। वेदीके मध्य ग्रह, लोकपाल, सूर्य और मरुदग्णोंकी पूजा करे। कलशके चारों ओर रुद्र और वसुओंका पूजन करे। कुश-कण्डिका करके तिल-यवसे हवन करे। विष्णुको उद्दिष्ट कर १०८ आहुतियाँ दे। अन्य देवताओंको यथाशक्ति आहुति प्रदान करे। यूप स्थापित कर चरुकी बलि दे। चतुर्दिक् कदली-स्तम्भ स्थापित कर ध्वजाएँ फहराये। दक्षिणामें स्वर्ण, तिल-धान्य एवं पयस्विनी गाय प्रदान करे। तुलसीको क्षीरधारा दे।

कुछ ऐसे भी वृक्ष हैं, जिनकी प्रतिष्ठा नहीं होती। जैसे—जयन्ती, सोमवृक्ष, सोमवट, पनस (कटहल), कदम्ब, निम्ब, कनकपाटला, शाल्मलि, निम्बक, बिम्ब, अशोक आदि। इनके अतिरिक्त भद्रक, शमीकोण, चंडातक, बक तथा खदिर आदि वृक्षोंकी प्रतिष्ठा तो करनी चाहिये, किंतु इनका कर्णवेध-संस्कार नहीं करना चाहिये।

(अध्याय १४—१७)

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