भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 314, कुल 654 में से

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पृष्ठ 314
  • प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *

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जीवन-दानका आदर्श

(जीमूतवाहन और शङ्खुचूड़की कथा)

रुद्रकिंकर वैतालने राजा विक्रमादित्यसे कहा—महाराज! कान्यकुब्ज (कन्नौज)-में दानशील, सत्यवादी एवं देवी-पूजनमें तत्पर एक ब्राह्मण रहता था। वह प्रतिग्रहसे प्राप्त द्रव्यका दान कर देता था। एक बार शारदीय नवदुर्गाका व्रत आया। उसे दानमें कुछ भी द्रव्य प्राप्त नहीं हो सका, अतः वह बहुत चिन्तित हो गया, सोचने लगा, कौन-सा उपाय करूँ, जिससे मुझे द्रव्यकी प्राप्ति हो। मैंने दुर्गा-पूजामें कन्याओंको निमन्त्रित किया है, अब उन्हें कैसे भोजन कराऊँगा। वह इसी चिन्तामें निमग्न हो रहा था कि देवीकी कृपासे उसे अनायास पाँच मुद्राएँ प्राप्त हो गयीं और उसीसे उसने व्रत सम्पन्न किया। उसने नौ दिनोंतक निराहार व्रत किया था। उस व्रतके प्रभावसे मरकर उसने देवस्वरूपको प्राप्त किया। फलतः वह विद्याधरोंका स्वामी जीमूतकेतु हुआ। वह हिमालय पर्वतके रम्य स्थानमें रहता था। वहाँ वह भक्तिपूर्वक कल्पवृक्षकी पूजा भी करता था। उस वृक्षके प्रभावसे उसे सभी कलाओंमें कुशल जीमूतवाहन नामका एक पुत्र प्राप्त हुआ।

पूर्वजन्ममें वह जीमूतवाहन मध्यदेशका शूरसेन नामक राजा था। किसी समय वह राजा शूरसेन आखेटके लिये महर्षि वाल्मीकिकी निवासभूमि उत्पलावर्त नामक वनमें आया। वहाँ चैत्र शुक्ला नवमीको उसने विधिवत् रामजन्मका श्रीरामनवमी-उत्सव किया। उसने महर्षि वाल्मीकिकी कुटीमें रात्रि-जागरण भी किया। राममयी गाथाके श्रवणजन्म पुण्यके प्रभावसे वह शूरसेन राजा ही जीमूतकेतुके पुत्र-रूपमें जीमूतवाहन नामक विद्याधर हुआ।

उस महात्मा जीमूतवाहनने भी कल्पवृक्षकी श्रद्धापूर्वक पूजा की। एक वर्षके भीतर ही प्रसन्न

होकर उस वृक्षने उससे वर माँगनेको कहा। इसपर जीमूतवाहनने कहा—‘महावृक्ष! मेरा नगर आपकी कृपासे धन-धान्य-सम्पन्न हो जाय। कल्पवृक्षने नगरको पृथ्वीमें सर्वश्रेष्ठ कर दिया। वहाँ कोई भी ऐसा नहीं था जो कल्पवृक्षके प्रभावसे राजाके समान न हो गया हो। अनन्तर वे पिता और पुत्र दोनों तपस्याके लिये वनमें चले गये और अतिशय रमणीय मलयाचलपर कठोर तपस्या करने लगे।’

राजन्! एक दिन राजा मलयध्वजकी पुत्री कमलाक्षी शिवकी पूजाके लिये अपनी सखियोंके साथ शिव-मन्दिरमें आयी। उसी समय जीमूतवाहन भी पूजाके लिये मन्दिरमें पहुँचा। सभी अलंकारोंसे अलंकृत दिव्य राजकन्याको देखकर उसे प्राप्त करनेकी इच्छा जीमूतवाहनको जाग्रत् हुई तथा इसके लिये उसने प्रार्थना भी की। अन्तमें कन्याके पिता मलयध्वजने जीमूतवाहनसे उसका विवाह करा दिया।

राजा मलयध्वजका पुत्र विश्वावसु एक दिन अपने बहनोंई जीमूतवाहनके साथ गन्धमादन पर्वतपर गया। वहाँ उसने नर-नारायणको प्रणाम किया। उसी शिखरपर भगवान् विष्णुका वाहन गरुड आया। उस समय शङ्खुचूड़ नागकी माता, जहाँ जीमूतवाहन था वहाँ विलाप कर रही थी। स्त्रीके करुणक्रन्दनको सुनकर दीनवत्सल जीमूतवाहन दुःखी होकर शीघ्र ही वहाँ पहुँचा। वृद्धाको आश्वासन देकर उसने पूछा—‘तुम क्यों रो रही हो? तुम्हें क्या कष्ट है?’ वह बोली—‘देव! आज मेरा पुत्र गरुडका भक्ष्य बनेगा, उसके वियोगके कारण दुःखसे व्याकुल होकर मैं रो रही हूँ।’ यह सुनकर राजा जीमूतवाहन गरुड-शिखरपर गया। गरुड उसे अपना भक्ष्य समझकर पकड़कर आकाशमें ले गया। जीमूतवाहनकी

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