भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- प्रतिसर्गपर्व, द्वितीय खण्ड *
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निषादपुत्र! मेरी बात सुनकर उस राजा चन्द्रचूड़ने पूजा-सामग्रियोंको एकत्रितकर आदरपूर्वक भगवान्की पूजा की; फलस्वरूप वे अपना नष्ट हुआ द्रव्य प्राप्तकर आज भी आनन्दित हो रहे हैं। इसलिये तुम भी भक्तिसे सत्यनारायणकी उपासना करो। इससे तुम इस लोकमें सुखको प्राप्त कर अन्तमें भगवान् विष्णुका सान्निध्य प्राप्त करोगे।
यह सुनकर वह निषाद कृतकृत्य हो गया। विप्रश्रेष्ठ शतानन्दको प्रणाम कर अपने घर जाकर उसने अपने साथियोंको भी हरि-सेवाका माहात्म्य बताया। उन सबने भी प्रसन्नचित्त हो श्रद्धापूर्वक यह प्रतिज्ञा की कि आज काष्ठको बेचकर हमलोगोंको जितना धन प्राप्त होगा, उससे अपने सभी बन्धु-
बान्धवोंके साथ श्रद्धा एवं विधिपूर्वक हम सत्यनारायणकी पूजा करेंगे। उस दिन उन्हें काष्ठ बेचनेसे पहलेकी अपेक्षा चौगुना धन मिला। घर आकर उन सबने सारी बात स्त्रियोंको बतायी और फिर सबने मिलकर आदरपूर्वक भगवान् सत्यनारायणकी पूजा की और कथाका श्रवण किया तथा भक्तिपूर्वक भगवान्का प्रसाद सबको वितरितकर स्वयं भी ग्रहण किया। पूजाके प्रभावसे पुत्र, पत्नी आदिसे समन्वित निषादगणोंने पृथ्वीपर द्रव्य और श्रेष्ठ ज्ञान-दृष्टिको प्राप्त किया। द्विजश्रेष्ठ! उन सबने यथेष्ट भोगोंका उपभोग किया और अन्तमें वे सभी योगिजनोंके लिये भी दुर्लभ वैष्णवधामको प्राप्त हुए। (अध्याय २७)
[ सत्यनारायणव्रत-कथाका चतुर्थ अध्याय ]
सत्यनारायणव्रतके प्रसंगमें साधु वणिक एवं जामाताकी कथा
सूतजी बोले—ऋषियो! अब मैं एक साधु वणिककी कथा कहता हूँ। एक बार भगवान् सत्यनारायणका भक्त मणिपूरक नगरका स्वामी महायशस्वी राजा चन्द्रचूड़ अपनी प्रजाओंके साथ व्रतपूर्वक सत्यनारायणभगवान्का पूजन कर रहा था, उसी समय रत्नपुर (रत्नसारपुर)-निवासी महाधनी साधु वणिक अपनी नौकाको धनसे परिपूर्ण कर नदी-तटसे यात्रा करता हुआ वहाँ आ पहुँचा। वहाँ उसने अनेक ग्रामवासियोंसहित मणि-मुक्तासे निर्मित तथा श्रेष्ठ वितानादिसे विभूषित पूजन-मण्डपको देखा, गीत-वाद्य आदिकी ध्वनि तथा वेदध्वनि भी वहाँ उसे सुनायी पड़ी। उस रम्य स्थानको देखकर साधु वणिकने अपने नाविकको
आदेश दिया कि यहाँपर नौका रोक दो। मैं यहाँके आयोजनको देखना चाहता हूँ। इसपर नाविकने वैसा ही किया। नावसे उतरकर उस वणिकने लोगोंसे जानकारी प्राप्त की और वह सत्यनारायण- भगवान्की कथा-मण्डपमें गया तथा वहाँ उसने उन सभीसे पूछा— 'महाशय! आपलोग यह कौन-सा पुण्यकार्य कर रहे हैं?' इसपर उन लोगोंने कहा— 'हमलोग अपने माननीय राजाके साथ भगवान् सत्यनारायणकी पूजा-कथाका आयोजन कर रहे हैं। इसी व्रतके अनुष्ठानसे इन्हें निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है। भगवान् सत्यनारायणकी पूजासे धनकी कामनावाला द्रव्य-लाभ, पुत्रकी कामनावाला उत्तम पुत्र, ज्ञानकी कामनावाला ज्ञान-दृष्टि प्राप्त
सुदाम्न्स्तपङ्कलकणा जग्ध्वा मानुष्यदुर्लभाः । सम्पदोऽदाद्धरिः प्रीत्या भक्तिमात्रमपेक्ष्यते ॥
गोपौ गृध्रो वणिग्व्याधो हनुमान् सविभीषणः । येऽन्ये पापात्मका दैत्या वृत्रकायाधवादयः ॥
नारायणान्तिकं प्राप्य मोदोऽद्यापि यद्दृशाः ।
(प्रतिसर्गपर्व २।२७।१५-१९)
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