भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 341, कुल 654 में से

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पाण्डवोंने इसे शिवजीका ही कृत्य समझा; वे क्रोधसे तिलमिला गये और अपने आयुधोंसे देवाधिदेव पिनाकीसे युद्ध करने लगे। भीम आदिद्वारा प्रयुक्त अस्त्र-शस्त्र शिवजीके शरीरमें समाहित हो गये। इसपर भगवान् शिवने कहा कि तुम श्रीकृष्णके उपासक हो अतः हमारे द्वारा तुमलोग रक्षित हो, अन्यथा तुमलोग वधके योग्य थे। इस अपराधका फल तुम्हें कलियुगमें जन्म लेकर भोगना पड़ेगा। ऐसा कहकर वे अदृश्य हो गये और पाण्डव बहुत दुःखी हुए। वे अपराधसे मुक्त होनेके लिये भगवान् श्रीकृष्णकी शरणमें आये। निःशस्त्र पाण्डवोंने श्रीकृष्णके साथ एकाग्र मनसे शंकरजीकी स्तुति की। इसपर भगवान् शंकरने प्रत्यक्ष प्रकट होकर उनसे वर माँगनेको कहा।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— देव! पाण्डवोंके जो शस्त्रास्त्र आपके शरीरमें लीन हो गये हैं, उन्हें पाण्डवोंको वापस कर दीजिये और इन्हें शापसे भी मुक्त कर दीजिये।

श्रीशिवजीने कहा— श्रीकृष्णचन्द्र! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। उस समय मैं आपकी मायासे मोहित हो गया था। उस मायाके अधीन होकर मैंने यह शाप दे दिया। यद्यपि मेरा वचन तो मिथ्या नहीं होगा तथापि ये पाण्डव तथा कौरव अपने अंशोंसे कलियुगमें उत्पन्न होकर अंशतः अपने पापोंका फल भोगकर मुक्त हो जायेंगे।

युधिष्ठिर वत्सरजका पुत्र होगा, उसका नाम

बलखानि (मलखान) होगा, वह शिरीष नगरका अधिपति होगा। भीमका नाम वीरण होगा और वह वनरसका राजा होगा। अर्जुनके अंशसे जो जन्म लेगा, वह महान् बुद्धिमान् और मेरा भक्त होगा। उसका जन्म परिमलके यहाँ होगा और नाम होगा ब्रह्मानन्द। महाबलशाली नकुलका जन्म कान्यकुब्जमें रत्नभानुके पुत्रके रूपमें होगा और नाम होगा लक्षण। सहदेव भीमसिंहका पुत्र होगा और उसका नाम होगा देवसिंह। धृतराष्ट्रके अंशसे अजमेरमें पृथ्वीराज जन्म लेगा और द्रौपदी पृथ्वीराजकी कन्याके रूपमें वेला नामसे प्रसिद्ध होगी। महादानी कर्ण तारक नामसे जन्म लेगा। उस समय रक्तबीजके रूपमें पृथ्वीपर मेरा भी अवतार होगा। कौरव माया-युद्धमें निष्पात होंगे तथा पाण्डु-पक्षके योद्धा धार्मिक और बलशाली होंगे।

सूतजी बोले— ऋषियो! यह सब बातें सुनकर श्रीकृष्ण मुस्कराये और उन्होंने कहा 'मैं भी अपनी शक्ति-विशेषसे अवतार लेकर पाण्डवोंकी सहायता करूँगा। मायादेवीद्वारा निर्मित महावती नामकी पुरीमें देशराजके पुत्र-रूपमें मेरा अंश उत्पन्न होगा, जो उदयसिंह (ऊदल) कहलायेगा, वह देवकीके गर्भसे उत्पन्न होगा। मेरे वैकुण्ठधामका अंश आह्लाद नामसे जन्म लेगा, वह मेरा गुरु होगा। अग्रिवंशसे उत्पन्न राजाओंका विनाश कर मैं (श्रीकृष्ण—उदयसिंह) धर्मकी स्थापना करूँगा।' श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर शिवजी अन्तर्हित हो गये।

राजा शालिवाहन तथा ईशामसीहकी कथा

सूतजीने कहा— ऋषियो! प्रातःकालमें पुत्रशोकसे पीड़ित सभी पाण्डव प्रेतकार्य कर पितामह भीष्मके पास आये। उनसे उन्होंने राजधर्म, मोक्षधर्म और दानधर्मोंके स्वरूपको अलग-अलग रूपसे भलीभाँति समझा। तदनन्तर उन्होंने

उत्तम आचरणोंसे तीन अक्षमेध-यज्ञ किये। पाण्डवोंने छत्तीस वर्षतक राज्य किया और अन्तमें वे स्वर्ग चले गये। कलिधर्मकी वृद्धि होनेपर वे भी अपने अंशसे उत्पन्न होंगे।

अब आप सब मुनिगण अपने-अपने स्थानको

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