भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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पृष्ठ 406
  • उत्तरपर्व *

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इनका सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं हो सकता। जीव नरकोंमें अनेक प्रकारकी दारुण व्यथा भोगते रहते हैं, परंतु उनके प्राण नहीं निकलते।

इससे भी अधिक दारुण यातनाएँ हैं, मृदुचित्त पुरुष उनको सुनकर ही दहलने लगते हैं। पुत्र, मित्र, स्त्री आदिके लिये प्राणी अनेक प्रकारका पाप करता है, परंतु उस समय कोई सहायता नहीं करता। केवल एकाकी ही वह दुःख भोगता है और प्रलयपर्यन्त नरकमें पड़ा रहता है। यह ध्रुव सिद्धान्त है कि अपना किया पाप स्वयं भोगना पड़ता है। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य शरीरको नश्वर जानकर लेशमात्र भी पाप न करे, पापसे अवश्य ही नरक भोगना पड़ता है। पापका फल दुःख है और नरकसे बढ़कर अधिक दुःख कहीं नहीं है। पापी मनुष्य नरकवासके अनन्तर फिर पृथ्वीपर जन्म लेते हैं। वृक्ष आदि अनेक प्रकारकी स्थावर योनियोंमें वे जन्म ग्रहण करते हैं और अनेक कष्ट भोगते हैं। अनन्तर कीट, पतंग, पक्षी, पशु आदि अनेक योनियोंमें जन्म लेते हुए अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाते हैं। स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाले मनुष्य-जन्मको पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे नरक न देखना पड़े। यह मनुष्य-योनि देवताओं तथा असुरोंके लिये भी अत्यन्त दुर्लभ है। धर्मसे ही मनुष्यका जन्म मिलता है। मनुष्य-जन्म पाकर उसे धर्मकी वृद्धि करनी चाहिये। जो अपने कल्याणके लिये धर्मका पालन नहीं करता है, उसके समान मूर्ख कौन होगा?

यह देश सब देशोंमें उत्तम है। बहुत पुण्यसे प्राणीका जन्म भारतवर्षमें होता है। इस देशमें जन्म पाकर जो अपने कल्याणके लिये पुण्य करता है, वही बुद्धिमान् है। जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अपने आत्माके साथ वञ्चना की। जबतक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक जो कुछ पुण्य बन सके वह कर लेना चाहिये। बादमें कुछ भी नहीं हो सकता। दिन-रातके बहाने नित्य आयुके ही अंश खण्डित हो रहे हैं। फिर भी मनुष्योंको बोध नहीं होता कि एक दिन मृत्यु आ पहुँचेगी*। यह तो किसीको भी निश्चय नहीं है कि किसकी मृत्यु किस समयमें होगी, फिर मनुष्यको क्योंकर धैर्य और सुख मिलता है? यह जानते हुए कि एक दिन इन सभी सामग्रियोंको छोड़कर अकेले चले जायेंगे, फिर अपने हाथसे ही अपनी सम्पत्ति सत्प्रात्रोंको क्यों नहीं बाँट देते? मनुष्यके लिये दान ही पाथेय अर्थात् रास्तेके लिये भोजन है। जो दान करते हैं, वे सुखपूर्वक जाते हैं। दानहीन मार्गमें अनेक दुःख पाते हैं, भूखे मरते जाते हैं। इन सब बातोंको विचारकर पुण्य ही करना चाहिये, पापसे सदा बचना चाहिये। पुण्य-कर्मोंसे देवत्व प्राप्त होता है और पाप करनेसे नरककी प्राप्ति होती है। जो सत्यरुष सर्वात्मभावसे श्रीसदाशिवकी शरणमें जाते हैं, वे पद्मपत्रपर स्थित जलकी तरह पापोंसे लिस नहीं होते। इसलिये दृन्द्रसे छूटकर भक्तिपूर्वक ईश्वरकी आराधना करनी चाहिये तथा सभी प्रकारके पापोंसे निरन्तर बचना चाहिये। (अध्याय ५-६)

  • आयुषः खण्डखण्डानि निपतन्ति तवाग्रतः। अहोरात्रापदेशेन किमर्थं नावबुध्यसे ॥ (उत्तरपर्व ६।११९)

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