भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 446, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 446
  • उत्तरपर्व *

४३५

फल प्राप्त होता है। भाद्रपद मासमें शुचि नामसे सूर्यका पूजन करे तो तुलापुरुष-दानका फल प्राप्त होता है। आश्विन शुक्ला सप्तमीको सविताकी पूजा करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। कार्तिक शुक्ला सप्तमीमें सप्तवाहन दिनेशकी पूजा करनेसे पुण्डरीक-यागका फल प्राप्त होता है। मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी सप्तमीमें भानुकी पूजा करनेसे दस राजसूय-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। पौष मासमें शुक्ल पक्षकी सप्तमीको भास्करकी पूजा करनेसे अनेक यज्ञोंका फल मिलता है। इसी प्रकार प्रत्येक मासके कृष्ण पक्षकी सप्तमीको भी उन-उन नामोंसे पूजा करनी चाहिये।

महाराज! इस प्रकार एक वर्षतक व्रत और पूजन कर उद्यापन करे। पवित्र भूमिपर एक हाथ, दो हाथ अथवा चार हाथ रक्त चन्दनका मण्डल बनाकर उसमें सिंदूर और गेरुका सूर्यमण्डल बनाये। कमल आदि रक्तपुष्पों, शल्लकी वृक्षके गोंद आदिसे

निर्मित धूप तथा अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे भगवान् सूर्यका पूजन करे। अत्र तथा स्वर्णसे भरे कलशोंको उनके सामने स्थापित करे। फिर अग्निसंस्कार कर तिल, घृत, गुड़ और आककी समिधाओंसे 'आ कृष्णो नो' (यजु० ३३। ४३) इस मन्त्रसे एक हजार आहुति दे। अनन्तर द्वादश ब्राह्मणोंको रक्त वस्त्र, एक-एक सवत्सा गौ, छतरी, जूता, दक्षिणा और भोजन देकर क्षमा-प्रार्थना करे। बादमें स्वयं भी मौन होकर भोजन करे।

इस विधिसे जो सप्तमीका व्रत करता है, वह नीरोग, कुशल वक्ता, रूपवान् और दीर्घायु होता है। जो पुरुष सप्तमीके दिन उपवास कर भगवान् सूर्यका दर्शन करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकमें निवास करता है। यह उभय-सप्तमीव्रत सम्पूर्ण अशुभोंको दूर कर आरोग्य और सूर्यलोक प्राप्त करानेवाला है, ऐसा देवर्षि नारदका कहना है। (अध्याय ४७)

कल्याणसप्तमी-व्रतकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! यदि इस संसार-सागरसे पार उतारनेवाला तथा स्वर्ग, आरोग्य एवं सुखप्रदायक कोई व्रत हो तो उसे आप बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जिस शुक्ला सप्तमीको आदित्यवार हो, उसे विजया-सप्तमी या कल्याण-सप्तमी कहते हैं। यह तिथि महापुण्यमयी है। इस दिन प्रातःकाल गोदुग्धयुक्त जलसे स्नानकर शुक्ल वस्त्र धारण कर अक्षतोंसे अति सुन्दर एक कर्णिकायुक्त अष्टदलकमल बनाये तथा पूर्वादि आठों दलोंमें क्रमशः पूर्व दिशामें 'ॐ तपनाय नमः,' अग्रिकोणमें 'ॐ मार्तण्डाय नमः,' दक्षिण

दिशामें 'ॐ दिवाकराय नमः,' नैऋत्यकोणमें 'ॐ विधत्रे नमः,' पश्चिम दिशामें 'ॐ वरुणाय नमः,' वायव्यकोणमें 'ॐ भास्कराय नमः,' उत्तर दिशामें 'ॐ विकर्तनाय नमः' तथा ईशानकोणमें 'ॐ रवये नमः'—इस प्रकारसे नाम-मन्त्रोंद्वारा कर्णिकाओंमें सभी उपचारोंसे पूजन करे। शुक्ल वस्त्र, फल, भक्ष्य पदार्थ, धूप, पुष्पमाला, गुड़ और लवणसे नमस्कारान्त इन नाम-मन्त्रोंसे वेदीके ऊपर पूजा करे। इसके बाद व्याहृति-होमकर यथाशक्ति ब्राह्मणभोजन कराये। गुरुको सुवर्णसहित तिलपात्र-दान करे। दूसरे दिन प्रातः उठकर नित्य-क्रियासे निवृत्त हो ब्राह्मणोंके साथ घृत एवं पायससे

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth