भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 448, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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कमलससमी-व्रत *
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! अब मैं कमलससमी-व्रतका वर्णन करता हूँ, जिसके नाम लेनेमात्रसे ही भगवान् सूर्य प्रसन्न हो जाते हैं। वसन्त-ऋतुमें शुक्ल पक्षकी ससमीको प्रातःकाल पीली सरसोंयुक्त जलसे स्नान करे। एक पात्रमें तिल रखकर उसमें सुवर्णका कमल बनाकर स्थापित करे और उसमें भगवान् सूर्यकी भावना कर दो वस्त्रोंसे आवृत करे तथा गन्ध-पुष्पादि उपचारोंसे पूजाकर निम्नलिखित श्लोकसे प्रार्थना करे—
नमस्ते पद्महस्ताय नमस्ते विश्वधारिणे ॥ दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते।
(उत्तरपर्व ५०। ३-४)
तदनन्तर वस्त्र, माला तथा अलंकारोंसे सुसज्जित
उस उदककुम्भको प्रतिमासहित ब्राह्मणकी पूजाकर प्रदान कर दे। दूसरे दिन अष्टमीको यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराये और स्वयं भी तेल आदिसे रहित विशुद्ध भोजन करे। इसी प्रकार वर्षपर्यन्त प्रत्येक मासकी शुक्ल ससमीको भक्तिपूर्वक व्रत करे। व्रतकी समाप्तिपर वह भक्तिपूर्वक सुवर्ण-कमल, सुवर्णकी पयस्विनी गौ, अनेक पात्र, आसन, दीप तथा अन्य सामग्रियाँ ब्राह्मणको दानमें दे। इस विधिसे जो कमल-ससमीका व्रत करता है, वह अनन्त लक्ष्मीको प्राप्त करता है और सूर्यलोकमें प्रसन्न होकर निवास करता है। कल्प-कल्पभर सात लोकोंमें निवास करता हुआ अन्तमें परमगतिको प्राप्त करता है। (अध्याय ५०)
शुभससमी-व्रतकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! अब मैं एक दूसरी ससमीका वर्णन कर रहा हूँ, वह शुभससमी कहलाती है। इसमें उपवासकर व्यक्ति रोग, शोक तथा दुःखोंसे मुक्त हो जाता है। इस पुण्यप्रद व्रतमें आश्विन मासमें (शुक्ल पक्षकी ससमी तिथिको) स्नान करके पवित्र हो ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराये। तदनन्तर गन्ध, माल्य तथा अनुलेपनादिसे भक्तिपूर्वक कपिला गौका निम्नलिखित मन्त्रसे पूजन करे—
नमामि सूर्यसम्भूतामशेषभुवनालयाम् ॥ त्वामहं शुभकल्याणशरीरां सर्वसिद्धये।
(उत्तरपर्व ५१। ३-४)
‘देवि! आप सूर्यसे उत्पन्न हुई हैं और सम्पूर्ण लोकोंकी आश्रयदात्री हैं, आपका शरीर सुशोभन मङ्गलोंसे युक्त है, आपको मैं समस्त सिद्धियोंकी
प्राप्तिसे निमित्त नमस्कार करता हूँ।’
तत्पश्चात् ताम्रपात्रमें एक सेर तिल रखकर उसपर वृषभकी स्वर्ण-प्रतिमा स्थापित करे और उसकी वस्त्र, माल्य, गुड़ आदिसे पूजा करे। सायंकालमें ‘अर्यमा प्रीयताम्’ यह कहकर सब सामग्री भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको निवेदित करे। रात्रिमें पञ्चगव्यका प्राशन करे तथा भूमिपर ही मात्सर्यरहित होकर शयन करे। प्रातः भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको पूजा आदिसे संतुष्ट करे। प्रत्येक मासमें दो वस्त्र, स्वर्णमय वृषभ और गौ आदिका पूजनपूर्वक दान करे। संवत्सरके अन्तमें ईख, गुड़, वस्त्र, पात्र, आसन, गद्दा, तकिया आदिसे समन्वित शय्या, एक सेर तिलसे पूर्ण ताम्रपात्र, सौवर्ण वृषभ ‘विश्वात्मा प्रीयताम्’ कहकर वेदज्ञ ब्राह्मणको दान करे। इस विधिसे शुभससमी-व्रत करनेवाला व्यक्ति जन्म-
- कई व्रत-निबन्धों एवं पुराणोंमें इसे ही कमल-पक्षी भी कहा गया है।
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