भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
बतलाकर वहीं अन्तर्हित हो गये। मनुष्यको सूर्यसे नीरोगता, अग्निसे धन, ईश्वर (शिवजी)-से ज्ञान और भगवान् जनार्दनसे मोक्षकी अभिलाषा करनी चाहिये१। यह व्रत बड़े-बड़े पापोंका
विनाशक, बाल-वृद्धिकारक तथा परम हितकारी है। जो मनुष्य अनन्यचित्त होकर इस व्रत-विधानको सुनता है, उसे भी सिद्धि प्राप्त होती है२। (अध्याय ५२)
अचलाससमी३-व्रत-कथा तथा व्रत-विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आपने सभी उत्तम फलोंको देनेवाले माघस्नानका४ विधान बतलाया था, परंतु जो प्रातःकाल स्नान करनेमें समर्थ न हो तो वह क्या करे? स्त्रियाँ अति सुकुमारी होती हैं, वे किस प्रकार माघस्नानका कष्ट सहन कर सकती हैं? इसलिये आप कोई ऐसा उपाय बतायें कि थोड़ेसे परिश्रमसे भी नारियोंको रूप, सौभाग्य, संतान और अनन्त पुण्य प्राप्त हो जाय।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं अचला-ससमीका अत्यन्त गोपनीय विधान आपको बतलाता हूँ, जिसके करनेसे सब उत्तम फल प्राप्त हो जाते हैं। इस सम्बन्धमें आप एक कथा सुनें—
मगध देशमें अति रूपवती इन्दुमती नामकी एक वेश्या रहती थी। एक दिन वह वेश्या प्रातःकाल बैठी-बैठी संसारकी अनवस्थिति (नश्वरता)-का इस प्रकार चिन्तन करने लगी—देखो! यह विषयरूपी संसार-सागर कैसा भयंकर है, जिसमें डूबते हुए जीव जन्म-मृत्यु-जरा आदिसे तथा जल-जन्तुओंसे पीड़ित होते हुए भी किसी प्रकार पार उतर नहीं पाते। ब्रह्माजीके द्वारा निर्मित यह प्राणिसमुदाय
अपने किये गये कर्मरूपी ईंधनसे एवं कालरूपी अग्निसे दग्ध कर दिया जाता है। प्राणियोंके जो धर्म, अर्थ, कामसे रहित दिन व्यतीत होते हैं, फिर वे कहाँ वापस आते हैं? जिस दिन स्नान, दान, तप, होम, स्वाध्याय, पितृतर्पण आदि सत्कर्म नहीं किया जाता, वह दिन व्यर्थ है। पुत्र, स्त्री, घर, क्षेत्र तथा धन आदिकी चिन्तामें सारी आयु बीत जाती है और मृत्यु आकर धर दबोचती है।
इस प्रकार कुछ निर्वीण—उद्विग्न होकर सोचती-विचारती हुई वह इन्दुमती वेश्या महर्षि वसिष्ठके आश्रममें गयी और उन्हें प्रणामकर हाथ जोड़कर कहने लगी—‘महाराज! मैंने न तो कभी कोई दान दिया, न जप, तप, व्रत, उपवास आदि सत्कर्मोंका अनुष्ठान किया और न शिव, विष्णु आदि किन्हीं देवताओंकी आराधना की, अब मैं इस भयंकर संसारसे भयभीत होकर आपकी शरण आयी हूँ, आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतलायें, जिससे मेरा उद्धार हो जाय।’
वसिष्ठजी बोले—‘वरानने! तुम माघ मासके शुक्ल पक्षकी ससमीको स्नान करो, जिससे रूप, सौभाग्य और सद्गति आदि सभी फल प्राप्त होते
१-आरोग्यं भास्करादिच्छेद्भूमिच्छेद्दुताशनात् । शंकराज्ज्ञानमिच्छेत्तु गतिमिच्छेज्जनार्दनात् ॥ (उत्तरपर्व ५२।३९)
२-भविष्यपुराणका यह अध्याय मत्स्यपुराण (अ० ६८)-से प्रायः मिलता है।
३-यह ससमी पुराणोंमें रथ, सूर्य, भानु, अर्क, महती, पुत्रससमी आदि अनेक नामोंसे विख्यात है और अनेक पुराणोंमें उन-उन नामोंसे अलग-अलग विधियाँ निर्दिष्ट हैं, जिनसे सभी अभिलाषाएँ पूरी होती हैं।
४-पुराणोंका परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। माघस्नानकी विस्तृत विधि पद्मपुराणके उत्तरखण्ड एवं वायुपुराणमें प्राप्त होती है। इनमें बड़ी सुन्दर एवं श्रेष्ठ कथाएँ हैं।
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