भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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३६ * संक्षिप्त भविष्यपुराण *


साथ बहुत वियोग होना, कठोर व्यवहार करना, पुरुषोंसे अत्यधिक वार्तालाप करना, अति क्रूर, अति सौम्य, अति निडर होना, ईर्ष्यालु तथा कृपण होना और किसी अन्य स्त्रीके वशीभूत हो जाना—ये सब स्त्रीके दोष उसके विनाशके हेतु हैं। ऐसी स्त्रियोंके अधीन यदि पुरुष हो जाता है तो वह भी निन्दनीय हो जाता है। यह पुरुषकी ही अयोग्यता है कि उसके भृत्य बिगड़ जाते हैं। स्वामी यदि कुशल न हो तो भृत्य और स्त्री बिगड़ जाते हैं, इसलिये समयके अनुसार यथोचित रीतिसे ताडन और शासनसे जिस भाँति हो इनकी रक्षा करनी चाहिये। नारी पुरुषका आधा शरीर है, उसके बिना धर्म-क्रियाओंकी साधना नहीं हो सकती। इस कारण स्त्रीका सदा आदर करना चाहिये। उसके प्रतिकूल नहीं करना चाहिये।

स्त्रीके पतिव्रता होनेके प्रायः तीन कारण देखे जाते हैं—(१) पर-पुरुषमें विरक्ति, (२) अपने पतिमें प्रीति तथा (३) अपनी रक्षामें समर्थता$^१$।

उत्तम स्त्रीको साम तथा दाननीतिसे अपने अधीन रखे। मध्यम स्त्रीको दान और भेदसे और अधम स्त्रीको भेद और दण्डनीतिसे वशीभूत करे। परंतु दण्ड देनेके अनन्तर भी साम-दान आदिसे उसको प्रसन्न कर ले। भर्ताका अहित करनेवाली और व्यभिचारिणी स्त्री कालकूट विषके समान होती है, इसलिये उसका परित्याग कर देना चाहिये। उत्तम कुलमें उत्पन्न पतिव्रता, विनीत और भर्ताका हित चाहनेवाली स्त्रीका सदा आदर करना चाहिये। इस रीतिसे जो पुरुष चलता है वह त्रिवर्गकी प्राप्ति करता है और लोकमें सुख पाता है।

**ब्रह्माजी बोले—**मुनीश्वरो! मैंने संक्षेपमें पुरुषोंको स्त्रियोंके साथ कैसे व्यवहार करना चाहिये, यह बताया। अब पुरुषोंके साथ स्त्रियोंको कैसा व्यवहार करना चाहिये, उसे बता रहा हूँ आप सब सुनें—

पतिकी सम्यक् आराधना करनेसे स्त्रियोंको पतिका प्रेम प्राप्त होता है तथा फिर पुत्र तथा स्वर्ग आदि भी उसे प्राप्त हो जाते हैं, इसलिये स्त्रीको पतिकी सेवा करना आवश्यक है। सम्पूर्ण कार्य विधिपूर्वक किये जानेपर ही उत्तम फल देते हैं और विधि-निषेधका ज्ञान शास्त्रसे जाना जाता है। स्त्रियोंका शास्त्रमें अधिकार नहीं है और न ग्रन्थोंके धारण करनेमें अधिकार है। इसलिये स्त्रीद्वारा शासन अनर्थकारी माना जाता है$^२$। स्त्रीको दूसरेसे विधि-निषेध जाननेकी अपेक्षा रहती है। पहले तो उसे भर्ता सब धर्मोंका निर्देश करता है और भर्ताके मरनेके अनन्तर पुत्र उसे विधवा एवं पतिव्रताके धर्म बतलाये। बुद्धिके विकल्पोंको छोड़कर अपने बड़े पुरुष जिस मार्गपर चले हों, उसीपर चलनेमें उसका सब प्रकारसे कल्याण है। पतिव्रता स्त्री ही गृहस्थके धर्मोंका मूल है। (अध्याय ८-९)


पतिव्रता स्त्रियोंके कर्तव्य एवं सदाचारका वर्णन, स्त्रियोंके लिये गृहस्थ-धर्मके उत्तम व्यवहारकी आवश्यक बातें$^३$

**ब्रह्माजी बोले—**मुनीश्वरो! गृहस्थ-धर्मका मूल पतिव्रता स्त्री है, पतिव्रता स्त्री पतिका आराधन किस विधिसे करे, उसका अब मैं वर्णन करता हूँ। आप सब इसे ध्यानपूर्वक सुनें।


१. सतीत्वे प्रायशः स्त्रीणां प्रदृष्टं कारणत्रयम्। परपुंसामसम्प्रीतिः प्रिये प्रीतिः स्वरक्षणे॥ (ब्राह्मपर्व ८।६६)
२. शास्त्राधिकारो न स्त्रीणां न ग्रन्थानां च धारणे। तस्मादिहान्ये मन्यन्ते तच्छासनमनर्थकम्॥ (ब्राह्मपर्व ९।६)
३. इस प्रकरणमें आगेके कुछ अंश—गोरक्षा, व्यापार, कृषि और लोक-संचालन आदि विषय प्रायः वार्ताशास्त्रसे सम्बन्धित हैं, जो लगभग नष्टप्राय हो गये हैं। इनका संक्षिप्त विवरण भविष्यपुराणमें मिलता है, जिसके कुछ अंश यहाँ दिये जा रहे हैं।