भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भगवान्को नैवेद्य निवेदित कर 'ॐ नमो वासुदेवाय'-का अष्टोत्तरशत-जप, तदनन्तर षडक्षर-मन्त्रसे हवन करना चाहिये तथा विधिपूर्वक सार्यकालीन संध्या करनी चाहिये। जमीनपर सोना चाहिये। ये सभी कार्य पाँच दिनोंतक किये जाने चाहिये। इस व्रतमें पहले दिन भगवान् विष्णुके चरणोंकी कमल-पुष्पोंके द्वारा पूजा करनी चाहिये। दूसरे दिन बिल्वपत्रके द्वारा उनके घुटनोंकी, तीसरे दिन नाभि-स्थलपर केवड़ेके पुष्पद्वारा पूजा करनी चाहिये। चौथे दिन बिल्व एवं जपा-पुष्पोंसे भगवान्के स्कन्ध-प्रदेशकी पूजा करनी चाहिये और पाँचवें दिन मालती-पुष्पोंसे भगवान्के शिरोभागकी पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार हृषीकेशका पूजन करते हुए व्रतीको एकादशीके दिन व्रत कर अभिमन्त्रित गोमय तथा द्वादशीको गोमूत्रका प्राशन करना चाहिये। त्रयोदशीको दूध तथा चतुर्दशीको दधिका प्राशन करना चाहिये। कायशुद्धिके लिये चारों दिन इनका प्राशन करना चाहिये। पाँचवें दिन स्नानकर केशवकी विधिवत्

पूजा करनी चाहिये। तत्पश्चात् ब्राह्मणको भक्तिपूर्वक भोजन कराकर दक्षिणा देनी चाहिये। इसी प्रकार पुराण-वाचकोंको भी वस्त्राभूषण प्रदान करना चाहिये। रात्रिमें पहले पञ्चगव्य-पान करके पीछे अन्न भोजन करे। इस प्रकारसे भीष्मपञ्चक-व्रतका समापन करना चाहिये। यह भीष्मपञ्चक-व्रत परम पवित्र और सम्पूर्ण पापोंका नाश करनेवाला है। राजन्! इसी भीष्मपञ्चक-व्रतका वर्णन शरशय्यापर पड़े हुए महात्मा भीष्मने स्वयं किया था। इसे मैंने आपको बता दिया। जो मानव भक्तिपूर्वक इस व्रतका पालन करता है, उसे भगवान् अच्युत मुक्ति प्रदान करते हैं। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ अथवा संन्यासी जो कोई भी इस व्रतको करते हैं, उन्हें वैष्णव-स्थान प्राप्त होता है। कार्तिक शुक्ल एकादशीसे व्रत प्रारम्भ करके पौर्णमासीको व्रत पूर्ण करना चाहिये। जो इस व्रतको सम्पन्न करता है, वह ब्रह्महत्या, गोहत्या आदि बड़े-बड़े पापोंसे भी मुक्त हो जाता है और शुद्ध सद्गतिको प्राप्त होता है। ऐसा भीष्मका वचन है। (अध्याय ७२)

मल्लद्वादशी एवं भीमद्वादशी-व्रतका विधान

युधिष्ठिरके द्वारा मल्लद्वादशीके विषयमें पूछे जानेपर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रने कहा—महाराज! जब मेरी अवस्था आठ वर्षकी थी, उस समय यमुना-तटपर भाण्डीर-वनमें वट-वृक्षके नीचे एक सिंहासनपर मुझे बैठाकर सुरभद्र, मण्डलीक, योगवर्धन तथा यक्षेन्द्रभद्र आदि बड़े-बड़े मल्लों और गोपाली, धन्या, विशाखा, ध्याननिष्ठिका, अनुगन्धा, सुभगा आदि गोपियोंने दही, दूध और फल-फूल आदिसे मेरा पूजन किया। तत्पश्चात् तीन सौ साठ मल्लोंने भक्तिपूर्वक मेरा पूजन करते हुए मल्लयुद्धको सम्पन्न किया तथा हमारी प्रसन्नताके लिये बड़ा भारी उत्सव मनाया। उस

महोत्सवमें भाँति-भाँतिके भक्ष्य-भोज्य, गोदान, गोष्ठी तथा पूजन आदि कार्य सम्पन्न किये गये थे। श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणोंका पूजन भी हुआ था। उसी दिनसे वह मल्लद्वादशी प्रचलित हुई। इस व्रतको मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीसे आरम्भ कर कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीतक करना चाहिये और प्रतिमास क्रमसे केशव, नारायण, माधव, गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन, त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर, हृषीकेश, पद्मनाभ तथा दामोदर—इन नामोंसे गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, गीत-वाद्य, नृत्यसहित पूजन करे और 'कृष्णो मे प्रीयताम्' इस प्रकार उच्चारण करे। यह द्वादशीव्रत मुझे

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