भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मुझे संतति दें और विशोका मुझे सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करें।' तदनन्तर श्वेत वस्त्रोंसे सूपको परिवेष्टित कर नाना प्रकारके फलों, वस्त्रों और स्वर्णमय कमलोंसे लक्ष्मीकी पूजा करे। चतुर व्रती सभी रात्रियोंमें कुशोदक-पान करे और सारी रात नृत्य-गीत आदिका आयोजन कराये। तीन पहर रात व्यतीत होनेपर व्रती मनुष्य स्वयं नींद त्यागकर जग जाय और अपनी शक्तिके अनुसार शय्यापर सोते हुए तीन या एक द्विज-दम्पतिके पास जाकर वस्त्र, पुष्पमाला और चन्दन आदिसे 'जलशायिने नमोऽस्तु' जलशायी भगवान्को नमस्कार है—यों कहकर उनकी पूजा करे। इस प्रकार रातमें गीत-वाद्य आदि कराकर जागरण करे तथा प्रातःकाल स्नान कर पुनः द्विज-दम्पतिका पूजन करे और कृपणता छोड़कर अपनी सामर्थ्यके अनुकूल उन्हें भोजन कराये। फिर स्वयं भोजन करके पुराणोंकी कथाएँ सुनते हुए वह दिन व्यतीत करे। प्रत्येक मासमें इसी विधिसे सारा कार्य सम्पन्न करना चाहिये।
इस प्रकार व्रतकी समाप्तिके अवसरपर गद्वा, चादर, तकिया आदि उपकरणोंसे युक्त एक सुन्दर शय्या गुड-धेनुके साथ दान करके इस प्रकार प्रार्थना करे—'देवेश! जिस प्रकार लक्ष्मी आपका परित्याग करके अन्यत्र नहीं जाती, उसी प्रकार सौन्दर्य, नीरोगता और निःशोकता सदा मुझे निरवच्छिन्नरूपसे प्राप्त हों—मेरा परित्याग न करें और भगवान् केशवके प्रति उत्तम भक्ति प्राप्त हो।' वैभवकी अभिलाषा रखनेवाले व्रतीको समन्त्र गुड-धेनुसहित शय्या और लक्ष्मीसहित सूप-दान करना चाहिये। इस व्रतमें कमल, करवीर (कनेर), बाण (नीलकुसुम या अगस्त्य-वृक्षका पुष्प), ताजा (बिना कुम्हलाया हुआ) कुंकुम, केसर, सिंदुवार, मल्लिका, गन्धपाटला, कदम्ब, कुब्जक और
जाती—ये पुष्प सदा प्रशस्त माने गये हैं।
युधिष्ठिरने पुनः पूछा—जगत्पते! अब आप मुझे (विशोकद्वादशीके प्रसङ्गमें निर्दिष्ट) गुड-धेनुका विधान बतलाइये। साथ ही यह भी बतलानेकी कृपा कीजिये कि गुड-धेनुका रूप कैसा होता है और उसे किस मन्त्रका पाठ करके दान करना चाहिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! इस लोकमें गुड-धेनुके विधानका जो रूप है और उसका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसे मैं बतला रहा हूँ। गुड-धेनुका दान समस्त पापोंका विनाशक है। गुड-धेनुका दान करनेके दिन गोबरसे भूमिको लीप-पोतकर सब ओरसे कुश बिछाकर उसपर चार हाथ लम्बा काला मृगचर्म स्थापित कर दे, जिसका अग्रभाग पूर्व दिशाकी ओर हो। तदनन्तर एक छोटे मृगचर्ममें बछड़ेकी कल्पना करके उसीके निकट रख दे। फिर उसमें पूर्वमुख और उत्तर पैरवाली सवत्सा गौकी कल्पना करे। चार भार२ गुडसे बनी हुई गुड-धेनु सदा उत्तम मानी गयी है। उसका बछड़ा एक भार गुडका बनाना चाहिये। अपने गृहकी सम्पत्तिके अनुसार इस (गौ)—का निर्माण कराना चाहिये। इस प्रकार गौ और बछड़ेकी कल्पना करके उन्हें श्वेत एवं महीन वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर घीसे उनके मुखकी, सीपसे कानोंकी, गन्नेसे पैरोंकी, श्वेत मोतीसे नेत्रोंकी, श्वेत सूतसे नाड़ियोंकी, श्वेत कम्बलसे गल-कम्बलकी, लाल रंगके चिह्नेसे पीठकी, श्वेत रंगके मृगपुच्छके बालोंसे रोएँकी, मूँगेसे दोनों भौँहोंकी, मक्खनसे दोनों स्तनोंकी, रेशमके धागेसे पूँछकी, काँसासे दोहनीकी, इन्द्रनीलमणिसे आँखोंकी तारिकाओंकी, सुवर्णसे सींगके आभूषणोंकी, चाँदीसे खुरोंकी और नाना प्रकारके फलोंसे नासापुटोंकी रचना कर धूप, दीप, आदिद्वारा उनकी अर्चना करनेके पश्चात् यों प्रार्थना करे—
१-विशोका दुःखनाशाय विशोका वरदास्तु मे। विशोका चास्तु संतत्यै विशोका सर्वसिद्धये ॥ (उत्तरपर्व ८४।१६)
२- दो हजार पल अर्थात् तीन मनके वजनको 'भार' कहते हैं।
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