भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 493, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें४८२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
समाप्त कर वर्षके अन्तमें गुरुको लवणपर्वतके साथ-साथ गौसहित शय्या-दान करना चाहिये। व्रती यदि सम्पत्तिशाली हो तो उसे वस्त्र, शृङ्गार-सामग्री और आभूषण आदिसे गुरुकी विधिपूर्वक पूजा कर ग्राम अथवा गृहके साथ-साथ भूमिका दान करना चाहिये। साथ ही अपनी शक्तिके अनुसार अन्यान्य ब्राह्मणोंको भी भोजन कराकर उन्हें वस्त्र, गोदान, रत्नसमूह और धनराशियोंद्वारा संतुष्ट करना चाहिये। स्वल्प धनवाला व्रती अपनी सामर्थ्यके अनुसार दान करे तथा जो व्रती परम निर्धन हो, किंतु भगवान् माधवके प्रति उसकी प्रगाढ़ निष्ठा हो तो उसे तीन वर्षतक पुष्पार्चनकी विधिसे इस व्रतका पालन करना चाहिये। जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे विभूतिद्रादशी-व्रतका अनुष्ठान करता है, वह स्वयं पापसे मुक्त होकर अपने सौ पीढ़ियोंतकके पितरोंको तार देता है। उसे एक लाख जन्मोंतक न तो शोकरूप फलका भागी होना पड़ता है, न व्याधि और दरिद्रता ही घेरती है तथा न बन्धनमें ही पड़ना पड़ता है। वह प्रत्येक जन्ममें विष्णु अथवा शिवका भक्त होता है। राजन्! जबतक एक सौ आठ सहस्र युग नहीं बीत जाते, तबतक वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और पुण्य-क्षीण होनेपर पुनः भूतलपर राजा होता है।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा— महाराज! बहुत पहले रथन्तरकल्पमें पुष्पवाहन नामका एक राजा हुआ था, जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात तथा तेजमें सूर्यके समान था। उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर ब्रह्मने उसे एक सोनेका कमल (—रूप विमान) प्रदान किया था, जिससे वह इच्छानुसार जहाँ-कहीं भी आ-जा सकता था। उसे पाकर उस समय राजा पुष्पवाहन अपने नगर एवं जनपदवासियोंके साथ उसपर आरूढ़ होकर स्वेच्छानुसार देवलोकमें तथा सातों द्वीपोंमें विचरण किया करता था, कल्पके आदिमें
पुष्करनिवासी उस पुष्पवाहनका सातवें द्वीपपर अधिकार था, इसीलिये लोकमें उसकी प्रतिष्ठा थी और आगे चलकर वह द्वीप पुष्करद्वीपके नामसे कहा जाने लगा। चूँकि देवेश्वर ब्रह्मने इसे कमलरूप विमान प्रदान किया था, इसलिये देवता एवं दानव उसे पुष्पवाहन कहा करते थे। तपस्याके प्रभावसे ब्रह्माद्वारा प्रदत्त कमलरूप विमानपर आरूढ़ होनेपर उसके लिये त्रिलोकीमें कोई भी स्थान अगम्य न था। नरेन्द्र! उसकी पत्नीका नाम लावण्यवती था। वह अनुपम सुन्दरी थी तथा हजारों नारियोंद्वारा चारों ओरसे समादृत होती रहती थी। वह राजाको उसी प्रकार अत्यन्त प्यारी थी, जैसे शंकरजीको पार्वतीजी परम प्रिय हैं। उसके दस हजार पुत्र थे, जो परम धार्मिक और धनुर्धारियोंमें अग्रगण्य थे। अपनी इन सारी विभूतियोंपर बारम्बार विचारकर राजा पुष्पवाहन विस्मय-विमुग्ध हो जाता था। एक बार (प्रचेताके पुत्र) मुनिवर वाल्मीकि* राजाके यहाँ पधारे। उन्हें आया देखकर राजाने उनसे इस प्रकार प्रश्न किया—
राजा पुष्पवाहने पूछा— मुनीन्द्र! किस कारणसे मुझे यह देवों तथा मानवोंद्वारा पूजनीय निर्मल विभूति तथा अपने सौन्दर्यसे समस्त देवाङ्गनाओंको पराजित कर देनेवाली सुन्दरी भार्या प्राप्त हुई है। मेरे थोड़े-से तपसे संतुष्ट होकर ब्रह्मने मुझे ऐसा कमल-गृह क्यों प्रदान किया, जिसमें अमात्य, हाथी, रथसमूह और जनपदवासियोंसहित यदि सौ करोड़ राजा बैठ जायें तो भी वे जान नहीं पड़ते कि कहाँ चले गये। वह विमान तारागणों, लोकपालों तथा देवताओंके लिये भी अलक्षित-सा रहता है। प्रचेतः! मैंने, मेरी पुत्रीने अथवा मेरी भार्याने पूर्वजन्मोंमें कौन-सा ऐसा कर्म किया है, जिसका प्रभाव आज दिखलायी पड़ रहा है, इसे आप बतलायें।
तदनन्तर महर्षि वाल्मीकि राजाके इस आकस्मिक
- वाल्मीकीय रामायण, उत्तरकाण्ड १३।१७, १६।१०, १११।११ तथा अध्यात्मरामायण ७।७।३१, बालरामायण, उत्तररामचरित आदिके अनुसार 'प्राचेतस' शब्द महर्षि वाल्मीकिका ही वाचक है।
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_17_1_Back In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharada Peeth