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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 502, कुल 654 में से

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पृष्ठ 502
  • उत्तरपर्व *

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सूर्यनारायणके समीप जाकर बोले—‘भगवन्! आप शीघ्र ही हमारे साथ ब्रह्मलोक चले।’ भगवान् सूर्यने कहा—‘मुने! हमारे चले जानेपर जगत्में अन्धकार छा जायगा, इसलिये हमारा चलना किस प्रकार हो सकता है, हम नहीं चल सकेंगे।’ यह सुनकर उत्थ्यमुनि वहाँसे चले आये और ब्रह्माजीको सब वृत्तान्त सुना दिया। तब ब्रह्माजीने अङ्किरामुनिसे सूर्यभगवान्को बुलानेके लिये कहा। अङ्किरामुनि ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर सूर्यनारायणके समीप गये और उनसे ब्रह्मलोक चलनेको कहा। सूर्यनारायणने वही उत्तर इनको भी दिया। तब अङ्किराने कहा—‘प्रभो! आप ब्रह्मलोक जायँ, मैं आपके स्थानपर यहाँ रहकर प्रकाश करूँगा।’ यह सुनकर सूर्यनारायण तो ब्रह्माजीके पास चले गये और अङ्किरा प्रचण्ड तेजसे तपने लगे। इधर भगवान् सूर्यने ब्रह्माजीसे पूछा—‘ब्रह्मन्! आपने किस निमित्तसे मुझे यहाँ बुलाया है?’ ब्रह्माजीने कहा—‘देव! आप शीघ्र ही अपने स्थानपर जायँ, नहीं तो अङ्किरामुनि सम्पूर्ण ब्रह्माण्डको दग्ध कर डालेंगे। देखिये उनके तापसे सभी लोग दग्ध हो रहे हैं। जबतक वे सब कुछ भस्म न कर डालें उससे पूर्व ही आप प्रतिष्ठित हो जायँ।’ यह सुनते ही सूर्यभगवान् पुनः अपने स्थानपर लौट आये और उन्होंने अङ्किरामुनिकी स्तुति कर उन्हें बिदा किया। अङ्किरा पुनः देवताओंके समीप आये। देवताओंने अङ्किरामुनिकी स्तुति की और कहा—‘भगवन्! जबतक हम अग्निको ढूँढ़ें तबतक आप अग्निके सभी कर्म कीजिये।’ देवताओंका ऐसा वचन सुनकर महर्षि अङ्किरा अग्निरूपमें देवकार्यादिको सम्पन्न करने लगे। जब अग्निदेव आये तो उन्होंने देखा कि अङ्किरामुनि अग्नि बनकर स्थित हैं। इसपर वे बोले—‘मुने! आप मेरा स्थान छोड़ दें। मैं आपकी शुभा नामकी

स्त्रीसे ज्येष्ठ एवं प्रिय पुत्रके रूपमें उत्पन्न होऊँगा और तब मेरा नाम होगा बृहस्पति। आपके और भी बहुत-से पुत्र-पौत्र होंगे।’ यह वर पाकर प्रसन्न हो महर्षि अङ्किराने अग्निका स्थान छोड़ दिया।

राजन्! अग्निदेवको चतुर्दशी तिथिको ही अपना स्थान प्राप्त हुआ था, इसलिये यह तिथि अग्निको अति प्रिय है और आग्नेयी चतुर्दशी तथा रौद्री चतुर्दशीके नामसे प्रसिद्ध है। स्वर्गमें देवता और भूमिपर मान्धाता, मनु, नहुष आदि बड़े-बड़े राजाओंने इस तिथिको माना है। जो पुरुष युद्धमें मारे जायँ, सर्प आदिके काटनेसे मरे हों और जिसने आत्मघात किया हो, उनका इस चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करना चाहिये, जिससे वे सद्भक्तिको प्राप्त हो जायँ। इस तिथिके व्रतका विधान इस प्रकार है—चतुर्दशीको उपवास करे और गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे त्रिलोचन श्रीसदाशिवका पूजन करे, रात्रिमें जागरण करे। रात्रिमें पञ्चगव्यका प्राशन कर भूमिपर ही शयन करे। तैल-क्षारसे रहित श्यामाक (साँवा)-का भोजन करे। अग्निके नाम-मन्त्रोंद्वारा काले तिलोंसे १०८ आहुतियाँ प्रदान करे। दूसरे दिन प्रातः स्नान कर पञ्चामृतसे शिवजीको स्नान कराकर भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और पूर्वोक्त रीतिसे हवनकर उनकी प्रार्थना करे। पीछे आरती कर ब्राह्मणको भोजन कराये। उनको दक्षिणा दे और मौन हो स्वयं भी भोजन करे। इस प्रकार एक वर्ष व्रत कर सुवर्णकी त्रिलोचन भगवान् शंकरकी प्रतिमा बनाये। प्रतिमाको चाँदीके वृषभपर स्थितकर दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित कर ताम्रपात्रमें स्थापित करे। तदनन्तर गन्ध, श्वेत पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको दे दे। जो एक वर्षतक इस व्रतको करता है, वह लम्बी आयु प्राप्त कर अन्तमें तीर्थमें प्राण परित्याग कर

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