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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 504, कुल 654 में से

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पृष्ठ 504
  • उत्तरपर्व *

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गया। वे एक नदीके किनारे पहुँचे। शीलाने देखा कि शुभ वस्त्रोंको पहने हुए कुछ स्त्रियाँ चतुर्दशीके दिन भक्तिपूर्वक जनार्दनकी अलग-अलग पूजा कर रही हैं। शीलाने उन स्त्रियोंके पास जाकर पूछा—‘देवियो! आपलोग यहाँ किसकी पूजा कर रही हैं, इस व्रतका क्या नाम है।’ इसपर वे स्त्रियाँ बोलीं—‘यह व्रत अनन्तचतुर्दशी नामसे प्रसिद्ध है।’ शीला बोली—‘मैं भी इस व्रतको करूँगी, इस व्रतका क्या विधान है, किस देवताकी इसमें पूजा की जाती है और दानमें क्या दिया जाता है, इसे आपलोग बतायें।’ इसपर स्त्रियोंने कहा—‘शीले! प्रस्थभर पक्कात्रका नैवेद्य बनाकर नदीतटपर जाय, वहाँ स्नान कर एक मण्डलमें अनन्तस्वरूप भगवान् विष्णुकी गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि उपचारोंसे पूजा करे और कथा सुने। उन्हें नैवेद्य अर्पित करे। नैवेद्यका आधा भाग ब्राह्मणको निवेदित कर आधा भाग प्रसादरूपमें ग्रहण करनेके लिये रखे। भगवान् अनन्तके सामने चौदह ग्रन्थियुक्त एक दोरक (डोरा) स्थापित कर उसे कुंकुमादिसे चर्चित करे। भगवान्को वह दोरक निवेदित करके पुरुष दाहिने हाथमें और स्त्री बायें हाथमें बाँध ले। दोरक-बन्धनका मन्त्र इस प्रकार है—

अनन्तसंसारमहासमुद्रे मग्नान् समभ्युद्भर वासुदेव। अनन्तरूपे विनियोजितात्मा ह्यनन्तरूपाय नमो नमस्ते॥

(उत्तरपर्व १४।३३)

‘हे वासुदेव! अनन्त संसाररूपी महासमुद्रमें मैं डूब रही हूँ, आप मेरा उद्धार करें, साथ ही अपने अनन्तस्वरूपमें मुझे भी आप विनियुक्त कर लें। हे अनन्तस्वरूप! आपको मेरा बार-बार प्रणाम है।’

दोरक बाँधनेके अनन्तर नैवेद्य ग्रहण करना चाहिये। अन्तमें विश्वरूपी अनन्तदेव भगवान्

नारायणका ध्यान कर अपने घर जाय। शीले! हमने इस अनन्तव्रतका वर्णन किया। तदनन्तर शीलाने भी विधिसे इस व्रतका अनुष्ठान किया। पाथेय निवेदित कर उसका आधा भाग ब्राह्मणको प्रदान कर आधा स्वयं ग्रहण किया और दोरक भी बाँधा। उसी समय शीलाले पति कौंडिन्य भी वहाँ आये। फिर वे दोनों बैलगाड़ीसे अपने घरकी ओर चल पड़े। घर पहुँचते ही व्रतके प्रभावसे उनका घर प्रचुर धन-धान्य एवं गोधनसे सम्पन्न हो गया। वह शीला भी मणि-मुक्ता तथा स्वर्णादिके हारों और वस्त्रोंसे सुशोभित हो गयी। वह साक्षात् सावित्रीके समान दिखलायी देने लगी। कुछ समय बाद एक दिन शीलाले हाथमें बँधे अनन्त-दोरकको उसके पतिने क्रुद्ध हो तोड़ दिया। उस विपरीत कर्मविपाकसे उनकी सारी लक्ष्मी नष्ट हो गयी, गोधन आदि चोरोंने चुरा लिया। सभी कुछ नष्ट हो गया। आपसमें कलह होने लगा। मित्रोंने सम्बन्ध तोड़ लिया। अनन्तभगवान्के तिरस्कार करनेसे उनके घरमें दरिद्रताका साम्राज्य छा गया। दुःखी होकर कौंडिन्य एक गहन वनमें चले गये और विचार करने लगे कि मुझे कब अनन्तभगवान्के दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होगा। उन्होंने पुनः निराहार रहकर तथा ब्रह्मचर्यपूर्वक भगवान् अनन्तका व्रत एवं उनके नामोंका जप किया और उनके दर्शनोंकी लालसासे विह्वल होकर वे पुनः दूसरे निर्जन वनमें गये। वहाँ उन्होंने एक फले-फूलें आम्र-वृक्षको देखा और उससे पूछा कि क्या तुमने अनन्तभगवान्को देखा है? तब उसने कहा—‘ब्राह्मण देवता! मैं अनन्तको नहीं जानता।’ इस प्रकार वृक्षों आदिसे अनन्तभगवान्के विषयमें पूछते-पूछते घास चरती हुई एक सवत्सा गौको देखा। कौंडिन्यने गौसे पूछा—‘धेनुके! क्या तुमने अनन्तको देखा है?’ गौने कहा—‘विभो! मैं अनन्तको नहीं जानती।’

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