भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 510, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
४९९
विष्णुलोकको जाता है। जो पुरुष पूर्णिमाको चन्द्रमाका पूजन और अमावास्याको पितृ-तर्पण, पिण्डदान
आदि करते हैं, वे कभी धन-धान्य-संतान आदिसे च्युत नहीं होते। (अध्याय ९९)
वैशाखी, कार्तिकी और माघी पूर्णिमाकी विधि
राजा युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! संवत्सरमें कौन-कौन तिथियाँ स्नान-दान आदिमें अधिक पुण्यप्रद हैं। उनका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! वैशाख, कार्तिक और माघ—इन तीन महीनोंकी पूर्णिमाएँ स्नान-दान आदिके लिये अति श्रेष्ठ हैं। इन तिथियोंमें स्नान, दान आदि अवश्य करने चाहिये। इन तिथियोंमें तीर्थोंमें स्नान करे और यथाशक्ति दान दे। वैशाखीको उज्जयिनी (शिप्रा)-में, कार्तिकीको पुष्करमें और माघीको वाराणसी (गङ्गा)-में स्नान करना चाहिये। इस दिन जो पितरोंका तर्पण करता है, वह अनन्त फल पाता है और पितरोंका उद्धार करता है। वैशाख-पूर्णिमाको अन्न, सुवर्ण वस्त्रसहित जलपूर्ण कलश ब्राह्मणको दान करनेसे व्रती सर्वथा शोकमुक्त हो जाता है। इस व्रतमें सुन्दर मधुर भोजनसे परिपूर्ण पात्र, गौ, भूमि, सुवर्ण तथा वस्त्र आदिका दान करना चाहिये। माघ-पूर्णिमाको देवता और पितरोंका तर्पण कर सुवर्णसहित तिलपात्र, कम्बल, रूईके वस्त्र, कपास, रत्न आदि ब्राह्मणको दे। कार्तिक-पूर्णिमाको वृषोत्सर्ग करे। भगवान् विष्णुका नीराजन करे। हाथी, घोड़े, रथ और घृत-धेनु आदि दस धेनुओंका दान करे और केला, खजूर, नारियल, अनार, संतरा, ककड़ी, बैंगन, केरला, कुंदुरु, कृष्णाण्ड आदि फलोंका दान करे। इन पुण्य तिथियोंमें जो स्नान, दान आदि नहीं करते, वे जन्मान्तरमें रोगी और दरिद्री होते हैं। ब्राह्मणोंको
दान देनेका तो फल है ही, परंतु बहन, भानजे, बुआ आदिको तथा दरिद्र बन्धुओंको भी दान देनेसे बड़ा पुण्य होता है। मित्र, कुलीन व्यक्ति, विपत्तिसे पीड़ित व्यक्ति, दरिद्री और आशासे आये अतिथिको दान देनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होती है। राजन्! सीता और लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्र जब वन चले गये थे, उस समय भरतजी अपने ननिहालमें थे। इधर लोगोंने माता कौसल्याको उनके विषयमें सशंकित कर दिया कि श्रीरामके वन-गमनमें भरत ही मुख्य हेतु हैं। फिर जब वे ननिहालसे वापस आये और उन्हें सारी बातें ज्ञात हुईं तो उन्होंने माताको अनेक प्रकारसे समझाया और शपथ भी ली, पर माताको विश्वास न हुआ, किंतु जब भरतने कहा कि 'माँ! भगवान् श्रीरामके वन-गमनमें यदि मेरी सम्मति रही हो तो देवताओंद्वारा पूजित तथा अनेक पुण्योंको प्रदान करनेवाली वैशाख, कार्तिक तथा माघकी पूर्णिमाएँ मेरे बिना स्नान-दानके ही व्यतीत हों और मुझे निम्र गति प्राप्त हो।' इस महान् शपथको सुनते ही माताको विश्वास हो गया और उन्होंने भरतको अपने अङ्क में ले लिया तथा अनेक प्रकारसे आश्चस्त किया। महाराज! इन तीनों तिथियोंका सम्पूर्ण माहात्म्य कौन वर्णन कर सकता है। मैंने संक्षेपमें कहा है। इन तीनों तिथियोंको जल, अन्न, वस्त्र, स्वर्णपात्र, छत्र आदि दान करनेवाले पुरुष इन्द्रलोकको प्राप्त करते हैं। (अध्याय १००)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth