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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 512, कुल 654 में से

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पृष्ठ 512
  • उत्तरपर्व *

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सावित्रीदेवीके वरसे प्राप्त हुई थी, इसलिये राजाने उसका नाम सावित्री ही रखा। धीरे-धीरे वह विवाहके योग्य हो गयी। सावित्रीने भी भृगुके उपदेशसे सावित्री-व्रत किया।

एक दिन वह व्रतके अनन्तर अपने पिताके पास गयी और प्रणाम कर वहाँ बैठ गयी। पिताने सावित्रीको विवाहयोग्य जानकर अमात्योंसे उसके विवाहके विषयमें मन्त्रणा की; पर उसके योग्य किसी श्रेष्ठ वरको न देखकर पिता अश्वपतिने सावित्रीसे कहा—‘पुत्रि! तुम वृद्धजनों तथा अमात्योंके साथ जाकर स्वयं ही अपने अनुरूप कोई वर दूँद लो।’ सावित्री भी पिताकी आज्ञा स्वीकार कर मन्त्रियोंके साथ चल पड़ी। स्वल्प कालमें ही राजर्षियोंके आश्रमों, सभी तीर्थों और तपोवनोंमें घूमती हुई तथा वृद्ध ऋषियोंका अभिनन्दन करती हुई वह मन्त्रियोंसहित पुनः अपने पिताके पास लौट आयी। सावित्रीने देखा कि राजसभामें देवर्षि नारद बैठे हुए हैं। सावित्रीने देवर्षि नारद और पिताको प्रणामकर अपना वृत्तान्त इस प्रकार बताया—महाराज! शाल्वदेशमें घुमत्सेन नामके एक धर्मात्मा राजा हैं। उनके सत्यवान् नामक पुत्रका मैंने वरण किया है।’ सावित्रीकी बात सुनकर देवर्षि नारद कहने लगे—‘राजन्! इसने बाल्य-स्वभाववश उचित निर्णय नहीं लिया। यद्यपि घुमत्सेनका पुत्र सभी गुणोंसे सम्पन्न है, परंतु उसमें एक बड़ा भारी दोष है कि आजके ही दिन ठीक एक वर्षके बाद उसकी मृत्यु हो जायगी।’ देवर्षि नारदकी वाणी सुनकर राजाने सावित्रीसे किसी अन्य वरको दूँदनेके लिये कहा।

सावित्री बोली—‘राजाओंकी आज्ञा एक ही बार होती है। पण्डितजन एक ही बार बोलते हैं

और कन्या भी एक ही बार दी जाती है—ये तीनों बातें बार-बार नहीं होतीं। सत्यवान् दीर्घायु हो अथवा अल्पायु, निर्गुण हो या गुणवान्, मैंने तो उसका वरण कर ही लिया, अब मैं दूसरे पतिको कभी नहीं चुनूँगी। जो कहा जाता है, उसका पहले विचारपूर्वक मनमें निश्चय कर लिया जाता है और जो वचन कह दिया जाय, वही करना चाहिये। इसलिये मैंने जो मनमें निश्चय कर कहा है, मैं वही करूँगी।’ सावित्रीका ऐसा निश्चययुक्त वचन सुनकर नारदजीने कहा—‘राजन्! आपकी कन्याको यही अभीष्ट है तो इस कार्यमें शीघ्रता करनी चाहिये। आपका यह दान-कर्म निर्विघ्न सम्पन्न हो।’ इस तरह कहकर नारदमुनि स्वर्ग चले गये और राजाने भी शुभ मुहूर्तमें सावित्रीका सत्यवान्से विवाह कर दिया। सावित्री भी मनोवाञ्छित पति प्राप्तकर अत्यन्त प्रसन्न हुई। दोनों अपने आश्रममें सुखपूर्वक रहने लगे। परंतु नारदमुनिकी वाणी सावित्रीके हृदयमें खटकती रहती थी। जब वर्ष पूरा होनेको आया, तब सावित्रीने विचार किया कि अब मेरे पतिकी मृत्युका समय समीप आ गया है। यह सोचकर सावित्रीने भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीसे तीन रात्रिका व्रत ग्रहण कर लिया और वह भगवती सावित्रीका जप, ध्यान, पूजन करती रही। उसे यह निश्चय था कि आजसे चौथे दिन सत्यवान्की मृत्यु होगी। सावित्रीने तीन दिन-रात नियमसे व्यतीत किये। चौथे दिन देवता-पितरोंको संतुष्ट कर उसने अपने ससुर और सासके चरणोंमें प्रणाम किया।

सत्यवान् वनसे काष्ठ लाया करता था। उस दिन भी वह काष्ठ लेनेके लिये जाने लगा। सावित्री भी उसके साथ जानेको उद्यत हो गयी। इसपर

१-सकृजल्पन्ति राजानः सकृजल्पन्ति पण्डिताः। सकृत् प्रदीयते कन्या त्रीण्येतानि सकृत्सकृत् ॥ (उत्तरपर्व १०२। २९)

२-यह व्रत अन्य वचनोंके अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण तथा शुक्ल द्वादशीसे पूर्णिमातक करनेकी परम्परा भी लोकमें प्रसिद्ध है।

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