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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 531, कुल 654 में से

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पृष्ठ 531

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भस्म कर दिया। पुनः ब्रह्माजीको दूसरी व्याधिरूप मृत्युकी उत्पत्ति करनी पड़ी।

दण्डकारण्यमें श्वेत नामक एक राजा रहता था, स्वर्ग जानेपर भी वह प्रतिदिन क्षुधाके कारण अपने मांसको ही खाकर कष्ट भोग रहा था। एक दिन दुःखी हो राजाने अगस्त्यमुनिसे कहा—‘महाराज! सभी वस्तुओंका दान तो मैंने किया है, परंतु अन्न और जलका दान मैं नहीं कर सका और न मैंने श्राद्ध ही किया। इसलिये मुझे इस रूपमें प्रतिदिन अपना ही मांस खाना पड़ रहा है। प्रभो! आप दया करके कोई उपाय कीजिये, जिससे कि मुझे इस विपत्तिसे छुटकारा प्राप्त हो।’ राजाद्वारा इस प्रकार दीन वचन सुनकर अगस्त्यमुनि दयार्द्र हो उठे और उन्होंने रत्नोद्वारा श्राद्ध कराया। श्राद्धके फलस्वरूप सहसा वह दिव्य देह धारणकर स्वर्गलोकमें दिव्य भोग भोगने लगा।

एक बार विन्ध्याचल पर्वतके हृदयमें यह प्रश्न उठा कि सूर्यनारायण मेरुपर्वतकी परिक्रमा तो करते हैं, पर मेरी नहीं करते। क्यों न मैं उनका मार्ग रोक दूँ। मनमें यह निश्चय कर विन्ध्यगिरि प्रतिदिन बढ़ने लगा। विन्ध्याचलको बढ़ते हुए देखकर सभी देवता व्याकुल हो उठे और उन्होंने अगस्त्यमुनिके पास जाकर निवेदन किया—‘प्रभो! आप कृपाकर सूर्यके मार्गको अवरुद्ध करनेवाले उस विन्ध्यगिरिको रोकें और उसे स्थिर कर दें।’ देवताओंका विनययुक्त वचन सुनकर अगस्त्यजीने विन्ध्याचल पर्वतके पास पहुँचकर कहा—‘पर्वतोत्तम! मैं तीर्थयात्रा करने जा रहा हूँ, तुम थोड़ा नीचे हो जाओ तो उस पार चला जाऊँ।’ मुनिकी आज्ञासे विन्ध्याचल नीचा हो गया। अगस्त्यमुनिने पर्वतको लाँघकर कहा—‘जबतक मैं तीर्थयात्रासे वापस नहीं आ जाता, तबतक तुम इसी स्थितिमें रहना।’ इतना कहकर

अगस्त्यमुनि दक्षिण दिशाको चले गये और फिर वापस नहीं लौटे। आज भी आकाशमें दक्षिण दिशामें देदीप्यमान हो रहे हैं और लोपामुद्राके साथ महर्षि अगस्त्यकी यह त्रिलोकी वन्दना करता है।

एक समयकी बात है, अपनी पत्नी लोपामुद्राकी इच्छापर अगस्त्यजीने कुबेरको बुलाकर आनन्दके सभी ऐश्वर्य महल, शय्या, वस्त्राभूषण आदि उन्हें उपलब्ध करा दिये और लोपामुद्राके साथ अगस्त्यजी बहुत समयतक आनन्दित होते रहे।

राजन्! इस प्रकार अगस्त्यमुनिके अनेक अद्भुत दिव्य चरित्र हैं। आप भी भगवान् अगस्त्यके लिये अर्घ्य प्रदान करें, इससे आपको महान् पुण्य प्राप्त होगा। उनके अर्घ्य-दानकी विधि इस प्रकार है—

जब कन्या राशिमें सूर्यके सात अंश (५।२२) शेष रहते हैं, उसी दिन महर्षि अगस्त्यका पूर्वमें उदय होता है, उसी समय उनके निमित्त अर्घ्य देना चाहिये। व्रतीको चाहिये कि प्रातः श्वेत तिलोंसे स्नानकर श्वेत वस्त्र, श्वेत पुष्पोंकी माला आदिसे विभूषित होकर पञ्चरत्नसहित एक सुवर्ण कलश स्थापित करे। उसके ऊपर अनेक प्रकारके भोज्य पदार्थ और सप्तधान्यसहित घीका पात्र रखे। उसके ऊपर जटाधारी, हाथमें कमण्डलु धारण किये हुए, शिष्योंके साथ अगस्त्यमुनिकी स्वर्ण-प्रतिमा बनाकर स्थापित करना चाहिये। तत्पश्चात् श्वेत चन्दन, चमेलीके पुष्प, उत्तम धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उनकी पूजा करनेके बाद अर्घ्य देना चाहिये। खजूर, नारियल, कूम्भाण्ड, खीरा, ककड़ी, कर्कोटक, आरवेल्ल, बीजपूर (बिजौरा), बैंगन, अनार, नारंगी, केला, कुशा, काश, दूर्वाके अंकुर, नीलकमल तथा अंकुरित अन्न—यह सभी सामग्री एक बाँसके पात्रमें रखकर सुवर्ण, चाँदी अथवा ताँबेका अर्घ्यपात्र नम्र हो सिरसे लगाकर प्रसन्न-चित्तसे जानुओंको पृथ्वीपर

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