भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
और वर्षके अन्तमें घृतपूर्ण नवीन कलशका दान करे तो उसे सौभाग्य प्राप्त होता है। इसे धाराव्रत कहा गया है। यह सभी रोगोंका नाशक, कान्ति एवं सौभाग्य-प्रदायक तथा सपत्नीके दर्पको नाश करनेवाला है।
गौरीसहित रुद्र, लक्ष्मीसहित विष्णु और राज्ञीसहित भगवान् सूर्यकी मूर्तियों विधिपूर्वक स्थापित कर उनका पूजन करे, घण्टायुक्त गौ, दोहनी और दक्षिणाके साथ उस मूर्तिको ब्राह्मणको दान दे। इस व्रतको देवव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे शरीर दिव्य हो जाता है।
श्वेत चन्दन, श्वेत पुष्प आदिसे शिवलिङ्ग और विष्णुकी मूर्तिका प्रतिदिन एक वर्षतक उपलेपन करनेके बाद जलसे भरे हुए घटके साथ सुन्दर गाय ब्राह्मणको दान दे। यह शुक्लव्रत है। यह व्रत बहुत कल्याणकारी है। इस व्रतको करनेवाला शिवलोकको प्राप्त करता है।
अश्वत्थ, सूर्यनारायण और गङ्गाजीका नित्य प्रणामपूर्वक पूजनकर नौ वर्षतक एकभुक्तव्रत करे, अन्तमें सपत्नीके ब्राह्मणकी पूजा कर तीन गाय और सुवर्णका वृक्ष ब्राह्मणको दान दे। इस व्रतको कीर्तिव्रत कहते हैं। यह व्रत ऐश्वर्य और कीर्तिको देनेवाला है। प्रतिदिन गोबरका मण्डल बनाकर उसमें अक्षतोंद्वारा कमल बनाये, उसके ऊपर शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, गौरी तथा गणपतिको घीसे स्नान कराकर एक वर्षतक प्रतिदिन पूजन करनेके बाद सामवेदका गान करके अन्तमें आठ अंगुलके सुवर्ण-कमलसहित उत्तम गाय ब्राह्मणको दान दे। इस व्रतको सामव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेवाला व्यक्ति शिवलोकको प्राप्त करता है।
नवमीको एकभुक्तव्रत कर अन्तमें कन्याओंको भोजन कराये तथा उन्हें कंचुकी, दो वस्त्र प्रदान करे एवं सुवर्णका सिंहासन भी ब्राह्मणको दे। इस
व्रतको वीरव्रत कहते हैं। जो स्त्री इस व्रतको करती है, उसे अनेक जन्मोंतक सुन्दर रूप, अखण्ड सौभाग्य और सुखकी प्राप्ति होती रहती है। व्रतीको शिवलोककी प्राप्ति होती है। अमावास्यासे जो एक वर्षपर्यन्त श्राद्ध करता है और श्रद्धापूर्वक पाँच पयस्विनी सवत्सा गौ, पीले वस्त्र तथा जलपूर्ण कलश दान करता है, वह व्यक्ति अपने पूर्वजोंका उद्धारकर विष्णुलोकको प्राप्त करता है। यह पितृव्रत कहलाता है।
जो स्त्री एक वर्षतक ताम्बूलका त्यागकर अन्तमें सुवर्णके तीन ताम्बूल बनाकर उसमें चूनेकी जगह मोती रखकर तथा सुपारीके चूर्णके साथ गणेशको निवेदित कर ब्राह्मणको दान करती है, उसे कभी भी दुर्भाग्यकी प्राप्ति नहीं होती, साथ ही मुखमें उत्तम सुगन्ध और सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। यह पत्रव्रत है। चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़—इन चार मासोंमें अथवा एक मास या एक पक्षपर्यन्त जलका अयाचितव्रत करना चाहिये। अन्तमें जलपूर्ण कलश, अन्न, वस्त्र, घी, ससधान्य, तिलपात्र और सुवर्ण ब्राह्मणको दे। इस व्रतको वारिव्रत कहते हैं। वारिव्रतको करनेवाला व्यक्ति एक कल्पपर्यन्त ब्रह्मलोकमें निवास करनेके बाद पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है।
जो एक वर्षतक पञ्चामृतसे भगवान् शिव और भगवान् विष्णुको स्नान कराकर अन्तमें गाय, शङ्ख और सुवर्ण ब्राह्मणको दान करता है, वह बहुत कालतक शिवलोकमें निवास करता है और राजाका पद प्राप्त करता है। यह वृत्तिव्रत कहलाता है। जो व्यक्ति सर्वथा मांसाहारका परित्याग कर अन्तमें सुवर्णका हरिण और सवत्सा गौ ब्राह्मणको दान करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। इसे अहिंसाव्रत कहते हैं, यह सम्पूर्ण शान्तियोंको देनेवाला है। जो माघ मासमें प्रातःकाल
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