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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 537, कुल 654 में से

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पृष्ठ 537

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

कोई कष्ट नहीं होता तथा उसका मार्ग सुखदायी होता है, इसे द्वारव्रत कहते हैं।

जो एक वर्षतक अष्टमीको रात्रिमें एक बार भोजन करता है तथा अन्तमें ब्राह्मणको पयस्विनी गौका दान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। इसे सुगतिव्रत कहते हैं। जो हेमन्त और शिशिर-ऋतुमें ईधनका दान करता है और अन्तमें घी तथा गाय ब्राह्मणको दान करता है, वह आरोग्य, द्युति, कान्ति तथा ब्रह्मपदको प्राप्त करता है। यह वैश्वानरव्रत सभी पापोंका नाशक है। जो एकादशीको नक्तव्रतकर चैत्र मासके चित्रा नक्षत्रमें सुवर्णका शङ्कु और चक्र ब्राह्मणको दान करता है, वह कल्पपर्यन्त विष्णुलोकमें निवास कर पृथ्वीपर राजाका पद प्राप्त करता है। यह विष्णुव्रत कहलाता है। जो एक वर्षतक पञ्चमीको दुग्धाहार कर अन्तमें दो गाय ब्राह्मणको दान करता है, वह एक कल्पतक लक्ष्मीलोकमें निवास करता है। यह देवीव्रत कहलाता है। जो एक वर्षतक सप्तमीके दिन नक्तव्रत कर अन्तमें पयस्विनी गाय ब्राह्मणको दान करता है, उसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। इसे भानुव्रत कहते हैं। जो चतुर्थीको एक वर्षतक रात्रिमें भोजन करता है और अन्तमें आठ गौएँ अग्निहोत्री ब्राह्मणको दान करता है, उसके सभी तरहके विघ्न दूर हो जाते हैं। इसे विनायकव्रत कहते हैं। जो चातुर्मास्यमें फलोंका त्याग कर कार्तिकमें सुवर्णका फल, दो गौ, दो श्वेत वस्त्र और घीसे पूर्ण घट दक्षिणासहित ब्राह्मणको दान करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। इसे फलव्रत कहते हैं।

एक वर्षतक सप्तमीको उपवास कर अन्तमें सुवर्णका कमल बनाकर और कांस्यकी दोहनीसहित सवत्सा गौ पौराणिक ब्राह्मणको दान करनेसे सूर्यलोककी प्राप्ति होती है। यह सौरव्रत है। जो बारह द्वादशियोंको उपवास करके अन्तमें यथाशक्ति

वस्त्रसहित जलपूर्ण बारह घट ब्राह्मणोंको दान करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। यह गोविन्दव्रत भगवान् गोविन्दके पदको प्राप्त करानेवाला है।

कार्तिक पूर्णिमाको वृषोत्सर्गकर रात्रिमें भोजन करना चाहिये। इस व्रतको वृषव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे गोलोककी प्राप्ति होती है। कुच्छ-प्रायश्चित्तेके अन्तमें गोदान कर यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन कराना चाहिये। यह प्राजापत्यव्रत है। इससे पापशुद्धि होती है। जो एक वर्षतक चतुर्दशीको नक्तव्रत करके अन्तमें दो गायोंका दान करता है, वह शैवपदको प्राप्त करता है। यह त्र्यम्बकव्रत है। सात रात्रि उपवास कर ब्राह्मणको घृतपूर्ण घटका दान करे। इसे ब्रह्मव्रत कहते हैं, इससे ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है।

कार्तिक मासके शुक्ल पक्षकी चतुर्दशीको उपवास कर रात्रिके समय पञ्चगव्य-पान करे अर्थात् कपिला गौका मूत्र, कृष्णा गौका गोबर, श्वेत गौका दूध, लाल गौका दही तथा कबरी गौका घी लेकर मन्त्रोंसे कुशोदक मिलाकर प्राशन करे। दूसरे दिन प्रातः स्नानकर देवता और पितरोंका तर्पण आदि करनेके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे। इसे ब्रह्मकूर्चव्रत कहते हैं। इस व्रतको करनेसे बाल्य, यौवन और बुढ़ापेमें किये गये सभी प्रकारके पापोंका नाश हो जाता है। जो एक वर्षतक तृतीयाको बिना पकाये अन्न, फल इत्यादिका भोजन करता है और अन्तमें सुन्दर गौ ब्राह्मणको दानमें देता है, वह शिवलोकमें निवास करता है। इसे ऋषिव्रत कहते हैं।

एक वर्षतक ताम्बूल आदि मुखवासके पदार्थोंका त्यागकर अन्तमें ब्राह्मणको गायका दान करे। यह सुमुखव्रत है। इससे कुबेरलोककी प्राप्ति होती है। रात्रिभर जलमें निवास कर प्रातःकाल जो गोदान करता है, उसे वरुणलोककी प्राप्ति होती है। यह

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