भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 540, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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और हेतुवादी (कुतार्किक)—इन पाँच व्यक्तियोंको शास्त्रोक्त तीर्थ-स्नान आदिका फल नहीं मिलता१।
प्रयाग, पुष्कर तथा कुरुक्षेत्र आदि तीर्थोंमें अथवा चाहे जिस स्थानपर माघ-स्नान करना हो तो प्रातःकाल ही स्नान करना चाहिये। माघ मासमें प्रातः सूर्योदयसे पूर्व स्नान करनेसे सभी महापातक दूर हो जाते हैं और प्राजापत्य-यज्ञका फल प्राप्त होता है। जो ब्राह्मण सदा प्रातःकाल स्नान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर परब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। उष्ण जलसे स्नान, बिना ज्ञानके मन्त्रका जप, श्रोत्रिय ब्राह्मणके बिना ब्राह्म और सायंकालके समय भोजन व्यर्थ होता है। वायव्य, वारुण, ब्राह्म और दिव्य—ये चार प्रकारके स्नान होते हैं। गायोंके रजसे वायव्य, मन्त्रोंसे ब्राह्म, समुद्र, नदी, तालाब इत्यादिके जलसे वारुण तथा वर्षाके जलसे स्नान करना दिव्य स्नान कहलाता है। इनमें वारुण स्नान विशिष्ट स्नान है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी और बालक, तरुण, वृद्ध, स्त्री तथा नपुंसक आदि सभी माघ मासमें तीर्थोंमें स्नान करनेसे उत्तम फल प्राप्त करते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मन्त्रपूर्वक स्नान करें और स्त्री तथा शुद्रोंको मन्त्रहीन स्नान करना चाहिये। माघ मासमें जलका यह कहना है कि जो सूर्योदय होते ही मुझमें स्नान करता है, उसके ब्रह्महत्या, सुरापान आदि बड़े-से-बड़े पाप भी हम तत्काल धोकर उसे सर्वथा शुद्ध एवं पवित्र कर डालते हैं२।
माघ-स्नानके व्रत करनेवाले व्रतीको चाहिये कि वह संन्यासीकी भाँति संयम-नियमसे रहे, दुष्टोंका साथ नहीं करे। इस प्रकारके नियमोंका दृढ़तासे पालन करनेसे सूर्य-चन्द्रके समान उत्तम
ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है।
पौष-फाल्गुनके मध्य मकरके सूर्यमें तीस दिन प्रातः माघ-स्नान करना चाहिये। ये तीस दिन विशेष पुण्यप्रद हैं। माघके प्रथम दिन ही संकल्पपूर्वक माघ-स्नानका नियम ग्रहण करना चाहिये। स्नान करने जाते समय व्रतीको बिना वस्त्र ओढ़े जानेसे जो कष्ट सहन करना पड़ता है, उससे उसे यात्रामें पग-पगपर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। तीर्थमें जाकर स्नानकर मस्तकपर मिट्टी लगाकर सूर्यको अर्घ्य देकर पितरोंका तर्पण करे। जलसे बाहर निकलकर इष्टदेवको प्रणामकर शङ्ख-चक्रधारी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीमाधवका पूजन करे। अपनी सामर्थ्यके अनुसार यदि हो सके तो प्रतिदिन हवन करे, एक बार भोजन करे, ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करे और भूमिपर शयन करे। असमर्थ होनेपर जितना नियमका पालन हो सके उतना ही करे, परंतु प्रातःस्नान अवश्य करना चाहिये। तिलका उबटन, तिलमिश्रित जलसे स्नान, तिलोंसे पितृतर्पण, तिलका हवन, तिलका दान और तिलसे बनी हुई सामग्रीका भोजन करनेसे किसी भी प्रकारका कष्ट नहीं होता३। तीर्थमें शीतके निवारण करनेके लिये अग्नि प्रज्वलित करनी चाहिये। तैल और आँवलेका दान करना चाहिये। इस प्रकार एक माहतक स्नानकर अन्तमें वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर ब्राह्मणका पूजन करे और कम्बल, मृगचर्म, वस्त्र, रत्न तथा अनेक प्रकारके पहननेवाले कपड़े, रजई, जूता एवं जो भी शीतनिवारक वस्त्र हैं, उनका दान कर 'माधवः प्रीयताम्' यह वाक्य कहना चाहिये। इस प्रकार माघ मासमें स्नान करनेवालेके अगम्यागमन, सुवर्णकी चोरी आदि गुप्त अथवा प्रकट जितने भी पातक हैं,
१-यस्य हस्ती च पादौ च वाङ्मनस्तु सुसंयतम् । विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्रुते ॥
अश्रुधानः पापात्मा नास्तिकोऽन्निच्छ्रसंशयः । हेतुनिष्ठाश्च पञ्चैते न तीर्थफलभागिनः ॥ (उत्तरपर्व १२२।३-४)
२-माघमासे रटन्त्यापः किञ्चिदभ्युदिते रवी । ब्रह्मघ्नं वा सुरापं वा कं कं तं तं पुनीमहे ॥ (उत्तरपर्व १२२।१५)
३-तिलञ्जायी तिलोद्भूता तिलभोक्ता तिलोदकी । तिलहोता च दाता च पदतिलो नावसीदति ॥ (उत्तरपर्व १२२।२७)
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