भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
आमलक तथा पाँच आमके वृक्ष लगाता है, वह कभी नरकका मुँह नहीं देखता*। जिसने जलाशय न बनवाया हो और एक भी वृक्ष न लगाया हो, उसने संसारमें जन्म लेकर कौन-सा कार्य किया। वृक्षोंके समान कोई भी परोपकारी नहीं है। वृक्ष धूपमें खड़े रहकर दूसरोंको छाया प्रदान करते हैं तथा फल, पुष्प आदिसे सबका सत्कार करते हैं। मानवोंकी शुभ गति पुत्रोंके बिना नहीं होती—यह कथन तो उचित ही है, किंतु यदि पुत्र कुपुत्र हो गया तो वह अपने पिताके लिये कलंकस्वरूप तथा नरकका हेतु भी बन जाता है। इसलिये विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि विधिपूर्वक वृक्षारोपण
करके उसका पालन-पोषण करे। इससे संसारमें न तो कलंक होता है और न निन्द्य गति ही प्राप्त होती है, बल्कि कीर्ति, यश एवं अन्तमें शुभ गति प्राप्त होती है।
इसी प्रकार जो व्यक्ति भव्य देव-मन्दिर बनवाकर उसमें देवमूर्तियोंकी प्रतिमाओंको स्थापित करता है, मन्दिरमें अनुलेपन, देवताओंका अभिषेक, दीपदान तथा विविध उपचारोंद्वारा उनकी अर्चा करता अथवा करवाता है, वह इस संसारमें राज्यश्री प्राप्त कर अन्तमें परमधामको प्राप्त करता है तथा इस लोकमें कीर्ति एवं यशरूपी शरीरसे प्रतिष्ठित रहता है। (अध्याय १२७—१२९)
दीपदानकी महिमाके प्रसंगमें जातिस्मरा रानी ललिताका आख्यान
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! वह कौन-सा व्रत, तप, नियम अथवा दान है, जिसके करनेसे इस लोकमें अत्यन्त तेजोमय शरीरकी प्राप्ति होती है। इसे आप बतायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! किसी समय पिंगल नामके एक तपस्वी मथुरामें आकर प्रवास कर रहे थे। उन तपस्वीसे देवी जाम्बवतीने भी यही प्रश्न किया था, उस विषयको आप सुनें—पिंगलमुनिने कहा था—‘देवि! संक्रान्ति, सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण, वैधृति, व्यतिपातयोग, उत्तरायण, दक्षिणायन, विषुव, एकादशी, शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी, तिथिक्षय, सप्तमी तथा अष्टमी—इन पुण्य दिनोंमें स्नान कर, व्रतपरायण स्त्री अथवा पुरुषको अपने आँगनके मध्य घृत-कुम्भ और जलता हुआ दीपक भूमिदेवको दान देना चाहिये। इससे प्रदीप्त एवं ओजस्वी शरीर प्राप्त होती है।’
राजा युधिष्ठिरने पूछा—मधुसूदन! भूमिके देवता कौन हैं? मेरे इस संशयको दूर करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! पूर्वकालमें सत्ययुगके आदिमें त्रिशंकु नामका एक (सूर्यवंशी) राजा था, जो सशरीर स्वर्गको जाना चाहता था। पर महर्षि वसिष्ठने उसे चाण्डाल बना दिया, इससे त्रिशंकु बहुत दुःखी हुआ और उसने विश्वामित्रजीसे समस्त वृत्तान्त कहा। इससे क्रुद्ध होकर विश्वामित्रने दूसरी सृष्टिकी रचना प्रारम्भ कर दी। उस सृष्टिमें सभी देवताओंके साथ-साथ त्रिशंकुके लिये दूसरा स्वर्ग बनाना प्रारम्भ कर दिया और शुद्धाटक (सिंघाड़ा), नारियल, कोद्वर, कृष्णाण्ड, ऊंट, भेड़ आदिका निर्माण किया एवं नये सप्तर्षि तथा देवताओंकी प्रतिमाका भी निर्माण कर दिया। उस समय इन्द्रने आकर इनकी प्रार्थना की और विश्वामित्रजीसे सृष्टि रोकनेका अनुरोध किया तथा
- अक्षतथमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश तिन्तिडीकान्। कपित्थबिल्वामलकीत्रयं च पञ्चाप्ररोपी नरकं न पश्येत्॥
(उत्तरपर्व १२८।११)
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