भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 56, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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पृथ्वीपर जन्म लेते हैं, तब उनके चिह्न—पुण्य-फल प्रत्यक्ष ही दिखलायी पड़ते हैं। यहाँ उन्हें हाथी, घोड़े, पालकी, रथ, सुवर्ण, रत्न, कंकण, केयूर, हार, कुण्डल, मुकुट, उत्तम वस्त्र, श्रेष्ठ सुन्दर स्त्री तथा अच्छे सेवक प्राप्त होते हैं। वे आधि-व्याधिसे मुक्त होकर दीर्घायु होते हैं। पुत्र-पौत्रादिका सुख देखते हैं और वन्दीजनोंके स्तुति-पाठद्वारा जगाये जाते हैं। इसके विपरीत जिसने व्रत, दान, उपवास आदि सत्कर्म नहीं किया वह काना, अंधा, लूला, लँगड़ा, गूँगा, कुबड़ा तथा रोग और दरिद्रतासे पीड़ित रहता है। संसारमें आज भी इन दोनों प्रकारके पुरुष प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं। यही पुण्य और पापकी प्रत्यक्ष परीक्षा है।
राजाने कहा—प्रभो! आपने अभी संक्षेपमें तिथियोंको बताया है। अब यह विस्तारसे बतलानेकी कृपा करें कि किस देवताकी किस तिथिमें पूजा करनी चाहिये और व्रत आदि किस विधिसे करने चाहिये जिनके करनेसे मैं पवित्र हो जाऊँ और द्वन्द्वरहित होकर यज्ञके फलोंको प्राप्त कर सकूँ*।
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! तिथियोंका रहस्य, पूजाका विधान, फल, नियम, देवता तथा अधिकारी आदिके विषयमें मैं बताता हूँ, यह सब आजतक मैंने किसीको नहीं बतलाया, इसे आप सुनें—
सबसे पहले मैं संक्षेपमें सृष्टिका वर्णन करता हूँ। प्रथम परमात्माने जल उत्पन्नकर उसमें तेज प्रविष्ट किया, उससे एक अण्ड उत्पन्न हुआ, उससे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उन्होंने सृष्टिकी इच्छासे उस अण्डके एक कपालसे भूमि और दूसरेसे आकाशकी रचना की। तदनन्तर दिशा, उपदिशा, देवता, दानव आदि रचे और जिस दिन यह सब काम किया उसका नाम प्रतिपदा तिथि रखा। ब्रह्माजीने इसे सर्वोत्तम
माना और सभी तिथियोंके प्रारम्भमें इसका प्रतिपादन किया इसलिये इसका नाम प्रतिपदा हुआ। इसीके बाद सभी तिथियाँ उत्पन्न हुईं।
अब मैं इसके उपवास-विधि और नियमोंका वर्णन करता हूँ। कार्तिक-पूर्णिमा, माघ-सप्तमी तथा वैशाख शुक्ल तृतीयासे इस प्रतिपदा तिथिके नियम एवं उपवासोंको विधिपूर्वक प्रारम्भ करना चाहिये। यदि प्रतिपदा तिथिसे नियम ग्रहण करना है तो प्रतिपदासे पूर्व चतुर्दशी तिथिको भोजनके अनन्तर व्रतका संकल्प लेना चाहिये। अमावास्याको त्रिकाल स्नान करे, भोजन न करे और गायत्रीका जप करता रहे। प्रतिपदाके दिन प्रातःकाल गन्ध-माल्य आदि उपचारोंसे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा करे और उन्हें यथाशक्ति दूध दे तथा बादमें 'ब्रह्माजी मुझपर प्रसन्न हों'—ऐसा कहे। स्वयं भी बादमें गायका दूध पिये। इस विधिसे एक वर्षतक व्रत कर अन्तमें गायत्रीसहित ब्रह्माजीका पूजन कर व्रत समाप्त करे।
इस विधानसे व्रत करनेपर व्रतीके सब पाप दूर हो जाते हैं और उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है। वह दिव्य शरीर धारणकर विमानमें बैठकर देवलोकमें देवताओंके साथ आनन्द प्राप्त करता है और जब इस पृथ्वीपर सत्ययुगमें जन्म लेता है तो दस जन्मतक वेदविद्याका पारगामी विद्वान्, धनवान्, दीर्घ आयुष्य, आरोग्यवान्, अनेक भोगोंसे सम्पन्न, यज्ञ करनेवाला, महादानी ब्राह्मण होता है। विश्वामित्रमुनिने ब्राह्मण होनेके लिये बहुत समयतक घोर तपस्या की, किंतु उन्हें ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं हो सका। अतः उन्होंने नियमसे इसी प्रतिपदाका व्रत किया। इससे थोड़ेसे समयमें ब्रह्माजीने उन्हें ब्राह्मण बना दिया। क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि कोई इस तिथिका व्रत
- नित्य, नैमित्तिक और काम्य—ये तीन प्रकारके कर्म होते हैं। यहाँ काम्य-कर्मोंका प्रकरण चल रहा है। इन्हीं कर्मोंको निष्कामभावसे भगवत्प्रतीत्यर्थ करनेपर जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति भी मिल जाती है।
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