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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 578, कुल 654 में से

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  • उत्तरपर्व *

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दिशाओंमें दस घृतपूरित दीपक प्रज्वलित करे। पुष्पमाला, चन्दन आदि भी चढ़ाये, साथ ही विष्णुस्तवराज, पुरुषसूक्त आदिका पाठ करे। सोलह सप्लीक ब्राह्मणोंमें लक्ष्मी-विष्णुकी भावना कर पूजा करे। अन्तमें पूजित सभी पदार्थ उन्हें निवेदित कर प्रार्थना करे कि 'ब्राह्मण देवता! भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हो जायँ।' शय्या-दान तथा गो-दान भी करे। जो काञ्चनपुरी आदिकी प्रतिमा पूजित की गयी है, उसे व्रती देख न सके, इसलिये वस्त्रसे आच्छादितकर अपने नेत्रोंको वस्त्रसे ढककर दीपके साथ मण्डपमें ले आये और आचार्य कहे—'आप सभी कामनाओंको देनेवाली एवं दुःख-दौर्भाग्यको दूर करनेवाली इस रमणीय काञ्चनपुरीका दर्शन करें।'

अनन्तर व्रती नेत्रके वस्त्रको खोलकर गुरुके सम्मुख पुष्पाञ्जलि देकर उस शुभ पुरीका दर्शन करे। तदनन्तर चाँदी, ताँबे अथवा किसी शङ्खमें पञ्चरत्न, गङ्गाजल, फल, सरसों, अक्षत, रोचना तथा दहीमिश्रित अर्घ्य बनाकर भगवान् विष्णुको प्रदान करे और प्रार्थना करे—'सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीनारायण! आप इस सुवर्णपुरीके प्रदान करनेसे मनोवाञ्छित फल पूर्ण करें। नारायण! लक्ष्मीकान्त! जगन्नाथ! आप इस अर्घ्यको ग्रहण करें, आपको नमस्कार है।'

इस प्रकार महातेजस्वी भगवान् विष्णुको अर्घ्य देकर भक्तिपूर्वक देवी लक्ष्मीको भी अर्घ्य प्रदान करना चाहिये और कहना चाहिये कि 'देवि! आप ब्रह्मा, विष्णु, शंकर, पार्वती एवं भगवान् कार्तिकेयसे पूजित हैं। धर्मकी कामनासे मेरे द्वारा भी आप पूजित हैं, आप मुझे सौभाग्य, पुत्र, धन, पौत्र प्रदान करें। देवि! आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्यको ग्रहण कर मुझे सुख प्रदान करें।' इस प्रकार व्रतको पूर्णकर महोत्सव मनाये एवं रात्रिमें जागरण करे। निद्रारहित होकर जागरण करनेसे सौ यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। प्रातःकाल निर्मल जलसे स्नानकर पितर और देवताओंकी पूजा कर सप्लीक ब्राह्मणोंको वस्त्र देकर भोजन कराये और यथाशक्ति दक्षिणा प्रदानकर क्षमा-याचना करे। दीन, अन्ध, बधिर, पंगु आदि सबको संतुष्ट करे। अनन्तर पारणा करे। तदनन्तर मधुर पायसयुक्त व्यञ्जनोसे मित्र और बान्धवोंके साथ भोजन करे। ऐसा करनेसे व्रती ब्रह्मलोकको प्राप्त कर ब्रह्माके साथ आनन्दमय जीवन व्यतीत करता है। अनन्तर रुद्रलोक, उसके बाद विष्णुलोकको प्राप्त करता है। देवि! काञ्चनपुरी नामक यह व्रत पूर्वसमयमें तुमने भी किया था, उसी पुण्यके प्रभावसे त्रैलोक्यपूजित मुझे स्वामीके रूपमें तुमने प्राप्त किया है।

(अध्याय १४७)

कन्या-दान एवं ब्राह्मणोंकी परिचर्याका माहात्म्य

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—'राजन्! जो विवाह करने योग्य कन्याको अलंकृतकर ब्राह्मविधिसे सुयोग्य वरको प्रदान करता है, वह सात पूर्व और सात आगे आनेवाली पीढ़ियोंको तथा अपने कुलके सभी मनुष्योंको भी इस कन्या-दानके पुण्यसे तार देता है, इसमें संदेह नहीं। जो प्राजापत्य-विधिके द्वारा

कन्या-दान करता है, वह दक्षप्रजापतिके लोकको प्राप्त करता है। वह अपना उद्धार कर अपार पुण्य प्राप्त करता है तथा अन्तमें स्वर्गलोक प्राप्त करता है। जो पृथ्वी, गौ, अश्व, गजका दान हीन वर्णको करता है, वह घोर नरकमें पड़ता है। शुल्क लेकर कन्याका दान करनेवाला घोर नरक प्राप्त करता

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