भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 597, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पदार्थका पूर्वजन्ममें मनुष्यने सम्पादन नहीं किया है, उसे शत्रु, मित्र, बान्धव, राजा आदि कोई भी नहीं दे सकते। पूर्वजन्ममें तुमने राज्यका दान किया था, वह तुम्हें प्राप्त हो गया, परंतु तुमलोगोंने मित्र, भृत्य आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रखा, अतः इस जन्ममें ये सब कैसे प्राप्त होंगे ?'
इसपर रानी शुभावती बोली—महाराज ! पूर्वजन्ममें जो हुआ वह तो बीत गया, अब इस समय आप ऐसा कोई व्रत, दान, उपवास, मन्त्र अथवा सिद्धयोग बतानेकी कृपा करें, जिससे मुझे पुत्र, धन, मित्र, भृत्य इत्यादि प्राप्त हो सकें। रानीका वचन सुनकर पिप्पलादमुनि बोले—'भद्रे ! एक आपाक नामका महादान है, जो सभी सम्पत्तियोंका प्रदायक है। श्रद्धापूर्वक कोई भी आपाकका दान करता है तो उसे महान् लाभ होता है। इसलिये तुम श्रद्धासे आपाकदान करो।' मुनिके कथनानुसार रानी शुभावतीने आपाकदान किया। फलतः उसे पुत्र, मित्र, धन और भृत्य प्राप्त हो गये।
भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज ! अब मैं उस आपाकदानकी विधि बता रहा हूँ, आप श्रद्धापूर्वक सुनें। बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि ग्रह और ताराबलका विचार कर शुभ मुहूर्तमें अगर, चन्दन, धूप, पुष्प, वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्य आदिसे भार्गव (कुम्हार)-का ऐसा सम्मान करे, जिससे वह संतुष्ट हो और उससे निवेदन करे कि महाभाग ! आप विश्वकर्मास्वरूप हैं। आप मेरे लिये सुन्दर छोटे-बड़े मिट्टीके घड़े, स्थाली, कसौरे, कलश आदि पात्रोंका निर्माण करें। भार्गव भी उन पात्रोंको बनाये। तदनन्तर विधिपूर्वक एक आँवों—भट्टी लगाये। अनन्तर उन एक हजार मिट्टीके पात्रोंको आँवेंमें स्थापित कर सार्यकालके समय उसमें अग्नि प्रज्वलित करे
और रात्रिको जागरणकर वाद्य, गीत, नृत्य आदिकी व्यवस्था कर उत्सव मनाये। सुप्रभात होते ही यजमान आँवोंकी अग्नि को शान्तकर पात्रोंको बाहर निकाल ले। अनन्तर स्नानकर श्वेत वस्त्र पहनकर उनमेंसे सोलह पात्रोंको सामने स्थापित करे। रक्त वस्त्रसे उन्हें आच्छादितकर पुष्पमालाओंसे उनका अर्चन करे और ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन आदि कराकर भार्गवका भी पूजन करे। ये पात्र माणिक्य, सोने, चाँदी अथवा मिट्टीतकके हो सकते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियोंकी पूजा कर भाण्डोंकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये और इन मन्त्रोंको पढ़ते हुए उन पात्रोंका दान करना चाहिये—
आपाक ब्रह्मरूपोऽसि भाण्डानीमानी जन्तवः । प्रदानात् ते प्रजापुष्टिः स्वर्गश्चास्तु ममाक्षयः ॥ भाण्डरूपाणि यान्यत्र कल्पितानि मया किल । भूत्वा सत्यात्ररूपाणि उपतिष्ठन्तु तानि मे ॥ (उत्तरपर्व १६७।३२-३३)
'आपाक (आँवों) ! आप ब्रह्मरूप हैं और ये सभी भाण्ड प्राणीरूप हैं। आपके दान करनेसे मुझे प्रजाओंसे पुष्टि प्राप्त हो, अक्षय स्वर्ग प्राप्त हो। मैंने जितने पात्र निर्माण कराये हैं, ये सभी सत्यात्रके रूपमें मेरे समक्ष प्रस्तुत रहें।'
जिसकी इच्छा जिस पात्रको लेनेकी हो उसे वह स्वयं ही ले ले, रोके नहीं। इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस आपाकदानको करते हैं, उससे तीन जन्मतक विश्वकर्मा संतुष्ट रहते हैं और पुत्र, मित्र, भृत्य, घर आदि सभी पदार्थ मिल जाते हैं। जो स्त्री इस दानको भक्तिपूर्वक करती है, वह सौभाग्यशाली पतिके साथ पुत्र-पौत्रादि सभी पदार्थोंको प्राप्त कर लेती है और अन्तमें अपने पतिसहित स्वर्गको जाती है। नरेश्वर ! यह आपाकदान भूमिदानके समान ही है।
(अध्याय १६७)
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