भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 599, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अन्नदानकी महिमाके प्रसंगमें राजा श्वेत और एक वैश्यकी कथा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! किसी समय मुनियोंने अन्नदानका जो माहात्म्य कहा था, उसे मैं कह रहा हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें। अनघ! आप अन्नदान करें, जिससे तत्काल संतुष्टि प्राप्त होती है। वनमें श्रीरामचन्द्रजीने दुःखी होकर लक्ष्मणसे कहा था—‘लक्ष्मण! सम्पूर्ण पृथ्वी अन्नसे परिपूर्ण है, फिर भी हमलोगोंको अन्न नहीं मिल रहा है, इससे यही जान पड़ता है कि हमलोगोंने पूर्वजन्ममें ब्राह्मणोंको कभी अन्नका भोजन नहीं कराया’।* मनुष्य जिस कर्मरूपी बीजको बोता है, जैसा कर्म करता है, वह उसीका फल पाता है। संसारमें यह ठीक ही कहा जाता है कि बिना दिये कुछ नहीं मिलता। भोजनयोग्य जिस अन्नका दान किया जाता है, वह अन्नदान परम श्रेयस्कर है। भारत! भोज्य पदार्थोंमें बहुतसे पदार्थ हैं, किंतु अन्नका दान सब दानोंसे श्रेष्ठ दान है। सत्यसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं, संतोषसे बड़ा कोई सुख नहीं और अन्नदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। ज्ञान, अनुलेपन और वस्त्रालंकारोंसे मनुष्योंको वैसी तृप्ति नहीं होती, जैसी भोजनसे होती है। इस विषयमें एक इतिहास है—
राजन्! बहुत पहले एक श्वेत नामके चक्रवर्ती राजा हुए हैं, उन्होंने अनेक यज्ञ किये और अनेक युद्धोंमें विजय प्राप्त की। अनेक प्रकारका दान दिये और धर्मपूर्वक राज्यपर शासन किया। राजाने अनेक प्रकारके उत्तम भोग भोगकर अन्तमें राज्यका परित्याग कर वनमें जाकर तपस्या की। अन्तमें वे दिव्य विमानमें आरूढ़ होकर स्वर्ग गये। वहाँ विद्याधर, किंनर आदिके साथ विहार करने लगे। अप्सराएँ उनकी सेवामें रहती थीं। गन्धर्व
उन्हें गीत सुनाकर रिझाते, इन्द्र भी उनका बड़ा सम्मान करते थे। राजाको दिव्य वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला आदि पहननेको तो मिलता था, परंतु भोजनके समय विमानमें बैठकर भूलोकमें आकर अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खाना पड़ता था। प्रतिदिन मांसका भोजन करनेके बाद भी पूर्वजन्मके कर्मके कारण उस पूर्वशरीरका मांस घटता नहीं था। इस प्रकार प्रतिदिन मांस-भक्षणसे व्याकुल होकर राजाने ब्रह्माजीसे कहा—‘ब्रह्मन्! आपके अनुग्रहसे मुझे स्वर्गका सुख प्राप्त हुआ है, सभी देवता मेरा आदर करते हैं। सभी सामग्री उपभोगके लिये प्राप्त होती रहती है, परंतु सभी भोगोंके रहते हुए भी यह पापिनी क्षुधा कभी शान्त नहीं होती, मुझे सदा सताती रहती है। इसी कारण मुझे अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खानेके लिये भूलोकमें जाना पड़ता है और इसमें मुझे बड़ी घृणा होती है। मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया है, जिससे मुझे उत्तम भोजन नहीं मिलता। आप कृपाकर ऐसा कोई उपाय बतायें, जिससे मेरा यह दुःख दूर हो जाय।’
ब्रह्माजी बोले—राजन्! आपने अनेक प्रकारके दान दिये हैं, बहुत-से यज्ञ किये हैं और गुरुजनोंको भी संतुष्ट किया है, परंतु ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट उत्तम व्यञ्जनोंका भोजन नहीं कराया। अन्नदान न करनेसे ही आज आपकी यह दशा हो रही है। अन्नसे बढ़कर कोई संजीवनी नहीं। अन्नको ही अमृत जानना चाहिये। इसलिये अब आप पृथ्वीपर जाकर वेदशास्त्र जाननेवाले कुलीन ब्राह्मणोंको भोजन करायें। उससे आपका यह दुःख दूर हो जायगा।
- पृथिव्यामन्नपूर्णायां वयमन्नस्य काङ्क्षिणः। सीमिन्ने नूनमस्माभिर्न ब्राह्मणमुखे हृतम् ॥ (उत्तरपर्व १६९।४)
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