भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 60, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
४९
द्वितीया-कल्पमें महर्षि च्यवनकी कथा एवं पुष्पद्वितीया-व्रतकी महिमा
सुमन्तु मुनि बोले—द्वितीया तिथिको च्यवन-ऋषिने इन्द्रके सम्मुख यज्ञमें अश्विनीकुमारोंको सोमपान कराया था।
राजाने पूछा—महाराज! इन्द्रके सम्मुख किस विधिसे अश्विनीकुमारोंको उन्होंने सोमरस पिलाया? क्या च्यवन-ऋषिकी तपस्याके प्रभावकी प्रबलतासे इन्द्र कुछ भी करनेमें समर्थ नहीं हुए?
सुमन्तु मुनिने कहा—सत्ययुगकी पूर्वसंध्यामें गङ्गाके तटपर समाधिस्थ हो च्यवनमुनि बहुत दिनोंसे तपस्यामें रत थे। एक समय अपनी सेना और अन्तःपुरके परिजनोंको साथ लेकर महाराज शर्याति गङ्गा-स्नानके लिये वहाँ आये। उन्होंने च्यवन-ऋषिके आश्रमके* समीप आकर गङ्गा-स्नान सम्पन्न किया तथा देवताओंकी आराधना की और पितरोंका तर्पण किया। तदनन्तर जब वे अपने नगरकी ओर जानेको उद्यत हुए तो उसी समय उनकी सभी सेनाएँ व्याकुल हो गयीं और मूत्र तथा विष्टा उनके अचानक ही बंद हो गये, आँखोंसे कुछ भी नहीं दिखायी दिया। सेनाकी यह दशा देखकर राजा घबड़ा उठे। राजा शर्याति प्रत्येक व्यक्तिसे पूछने लगे—यह तपस्वी च्यवनमुनिका पवित्र आश्रम है, किसिने कुछ अपराध तो नहीं किया? उनके इस प्रकार पूछनेपर किसिने कुछ भी नहीं कहा।
सुकन्याने अपने पितासे कहा—महाराज! मैंने एक आश्चर्य देखा, जिसका मैं वर्णन कर रही हूँ। अपनी सहेलियोंके साथ मैं वन-विहार कर रही थी
कि एक ओरसे मुझे यह शब्द सुनायी पड़ा—‘सुकन्ये! तुम इधर आओ, तुम इधर आओ।’ यह सुनकर मैं अपनी सखियोंके साथ उस शब्दकी ओर गयी। वहाँ जाकर मैंने एक बहुत ऊँचा वल्मीक देखा।
उसके अंदरके छिद्रोंमें दीपकके समान देदीप्यमान दो पदार्थ मुझे दिखलायी पड़े। उन्हें देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि ये पद्मरागमणिके समान क्या चमक रहे हैं। मैंने अपनी मूर्खता और चञ्चलतासे कुशाके अग्रभागसे वल्मीकके प्रकाशयुक्त छिद्रोंको बींध दिया, जिससे वह तेज शान्त हो गया।
यह सुनकर राजा बहुत व्याकुल हो गये और अपनी कन्या सुकन्याको लेकर वहाँ गये जहाँ च्यवनमुनि तपस्यामें रत थे। च्यवन-ऋषिको वहाँ
- अन्य पुराणोंमें तथा महाभारतके अनुसार यह आश्रम सोनभद्र और वधूसरा नदीके संगमपर था, जो आज देवकुण्डके नामसे प्रसिद्ध है। प्रायः पुराणोंमें यह श्लोक भी प्राप्त होता है—
मगधे तु गया पुण्या नदी पुण्या पुनःपुना। च्यवनस्य आश्रमं पुण्यं पुण्यं राजगृहं वनम् ॥
तथा—
वधूसरेति सरिता च्यवनस्याश्रमं प्रति।
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth