सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 601

५९०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वैसी स्थिति देखकर उसने सर्पसे कहा—‘पत्रग ! तुम मेरे पुत्रके मस्तकपर फण फैलाये क्यों बैठे हो ? यह ठीक ही कहा गया है कि मूर्ख मित्र और हीन जातिमें उत्पन्न प्राणीके साथ सम्बन्ध करना अपने हाथसे जलता हुआ अंगारा उठाना है१ ।’ वणिककी बात सुनकर साँपने कहा—‘धनेश्वर ! तुम्हारे पुत्रने मुझे निरपराध ही मारा है, इसलिये तुम्हारे सामने ही मैं इसका प्राण ले रहा हूँ, जिससे अन्य कोई भी व्यक्ति ऐसा काम न करे ।’ यह सुनकर धनेश्वरने कहा—‘सर्प ! जो उपकार, भक्ति तथा स्नेह आदिको भूलकर अपने रास्तेसे भटक जाय अर्थात् अपने कर्तव्यमार्गको छोड़ दे, उसे कौन रोक सकता है, परंतु क्षणमात्र तुम इस बालकको छोड़ दो, दंश न करो, जिससे मैं ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपना और्ध्वदैहिक कर्म अपने हाथसे कर सकूँ, क्योंकि बादमें मेरे पास कोई पुत्र नहीं रहेगा ।’ सर्पने इस बातको स्वीकार कर लिया ।

तदनन्तर वैश्यने वेदवेत्ता और जितेन्द्रिय एक हजार ब्राह्मणों तथा सन्यासियों आदिको घी, पायससहित मधुर स्वादिष्ट भोजन कराया । भोजनसे संतुष्ट हो ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर कहा—

वणिष्पुत्र चिरं जीव नश्यन्तु तव शत्रवः ।

अभीष्टफलसंसिद्धिरस्तु ते ब्राह्मणाज्ञया ॥

(उत्तरपर्व १६९।६३)

‘वणिष्पुत्र ! ब्राह्मणोंकी आज्ञासे तुम चिरंजीवी होओ, तुम्हारे सभी शत्रु नष्ट हो जायँ और तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो जाय ।’

ऐसा कहकर ब्राह्मणोंने अक्षत और पुष्प वैश्यपुत्रके

मस्तकपर छोड़े । ब्राह्मणोंके वागवज्रसे ताड़ित होकर वह सर्प मस्तकसे गिरा और मर गया । सर्पको मरा हुआ देखकर धनेश्वरको बड़ा दुःख हुआ और वह सोचने लगा कि मैंने इस सर्पको पुत्रकी भाँति पाला था और आज यह मेरे ही दोषसे मर गया । यह बड़ा ही अनुचित हुआ । उपकार करनेवालेमें जो साधुता रखता है, उसकी साधुतामें कौन-सी विशेषता रहती है ? अर्थात् वह प्रशंसाके योग्य नहीं है, किंतु जो अपकारियोंमें साधुता रखता है, उसकी साधुता ही सराहनीय है२ ।

इस प्रकार अनेक प्रकारसे पश्चात्ताप करते हुए दुःखी होकर वैश्यने न तो उस दिन भोजन किया, न ही रात्रिमें सो सका । प्रातःकाल होते ही गङ्गामें स्नान कर देवता-पितरोंका पूजन-तर्पण आदि कर घर आया और पुनः एक हजार ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके उत्तम व्यञ्जनोंका भोजन कराकर संतुष्ट किया । इसपर ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर कहा—‘धनेश्वर ! हमलोग तुमसे बहुत ही संतुष्ट हैं, इसलिये तुम वर माँगो । यह सुनकर उसने वर माँगा कि ‘यह मृत सर्प पुनः जीवित हो जाय ।’ वैश्यके यह कहनेपर ब्राह्मणोंने अभिमन्त्रित जल सर्पके ऊपर छिड़का । जलके छींटे पड़ते ही वह सर्प जीवित हो गया । यह देखकर धनेश्वर बड़ा ही प्रसन्न हुआ और नगरके लोग धनेश्वरकी प्रशंसा करने लगे ।’

महाराज ! यह सहस्र-ब्राह्मण-भोजन (अन्नदान)-का संक्षेपसे मैंने माहात्म्य वर्णन किया । जो व्यक्ति ब्राह्मणोंको और अभ्यागर्तोंको अन्न देता है, वह बहुत दिनतक संसार-सुखको भोगकर विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है । (अध्याय १६९)

१-मूर्ख मित्रं सम्बन्धं हीनजातिजनों हि यः । यः करोत्यनुधोऽङ्गारान् स स्वहस्तेन कर्षति ॥ (उत्तरपर्व १६९।५६)

२-उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः । अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्धिरिव्यते ॥ (उत्तरपर्व १६९।६७)

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth