भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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शर्त हमें स्वीकार है। आप हमें उत्तम रूपवान् बना दें, फिर सुकन्या चाहे जिसे वरण करे। च्यवनमुनिके इतना कहनेपर अश्विनीकुमार च्यवनमुनिको लेकर गङ्गाजीके जलमें प्रविष्ट हो गये और कुछ देर बाद तीनों ही बाहर निकले। सुकन्याने देखा कि ये तीनों तो समान रूप, समान अवस्था तथा समान वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत हैं, फिर इनमें मेरे पति च्यवनमुनि कौन हैं? वह कुछ निश्चित न कर सकी और व्याकुल हो अश्विनीकुमारोंकी प्रार्थना करने लगी।
सुकन्या बोली—देवो! अत्यन्त कुरूप पतिदेवका भी मैंने परित्याग नहीं किया था। अब तो आपकी कृपासे उनका रूप आपके समान सुन्दर हो गया है, फिर मैं कैसे उनका परित्याग कर सकती हूँ। मैं आपकी शरण हूँ, मुझपर कृपा कीजिये।
सुकन्याकी इस प्रार्थनासे अश्विनीकुमार प्रसन्न हो गये और उन्होंने देवताओंके चिह्नोंको धारण
कर लिया। सुकन्याने देखा कि तीन पुरुषोंमेंसे दोकी पलकें गिर नहीं रही हैं और उनके चरण भूमिको स्पर्श नहीं कर रहे हैं, किंतु जो तीसरा
पुरुष है, वह भूमिपर खड़ा है और उसकी पलकें भी गिर रही हैं। इन चिह्नोंको देखकर सुकन्याने निश्चित कर लिया कि ये तीसरे पुरुष ही मेरे स्वामी च्यवनमुनि हैं। तब उसने उनका वरण कर लिया। उसी समय आकाशसे उसपर पुष्प-वृष्टि होने लगी और देवगण दुन्दुभि बजाने लगे।
च्यवनमुनिने अश्विनीकुमारोंसे कहा—देवो! आप लोगोंने मुझपर बहुत उपकार किया है, जिसके फलस्वरूप मुझे उत्तम रूप और उत्तम पत्नी प्राप्त हुई। अब मैं आपलोगोंका क्या प्रत्युपकार करूँ, क्योंकि जो उपकार करनेवालेका प्रत्युपकार नहीं करता, वह क्रमसे इक्कीस नरकोंमें जाता है*, इसलिये आपका मैं क्या प्रिय करूँ, आप लोग कहें।
अश्विनीकुमारोंने उनसे कहा—महात्मन्! यदि आप हमारा प्रिय करना ही चाहते हैं तो अन्य देवताओंकी तरह हमें भी यज्ञभाग दिलवाइये। च्यवनमुनिने यह बात स्वीकार कर ली, फिर वे उन्हें विदाकर अपनी भार्या सुकन्याके साथ अपने आश्रममें आ गये।
राजा शर्यातिको जब यह सारा वृत्तान्त ज्ञात हुआ तो वे भी रानीको साथ लेकर सुन्दर रूप-प्राप्त महातेजस्वी च्यवन-ऋषिको देखने आश्रममें आये। राजाने च्यवनमुनिको प्रणाम किया और उन्होंने भी राजाका स्वागत किया। सुकन्याने अपनी माताका आलिङ्गन किया। राजा शर्याति अपने जामाता महामुनि च्यवनका उत्तम रूप देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
च्यवनमुनिने राजासे कहा—राजन्! एक महायज्ञकी सामग्री एकत्र कीजिये, हम आपसे यज्ञ करायेंगे। च्यवनमुनिकी आज्ञा प्राप्तकर राजा शर्याति अपनी राजधानी लौट आये और यज्ञ-सामग्री एकत्रकर यज्ञकी तैयारी करने लगे। मन्त्री,
- उपकारं वरिष्ठं यो न करोत्युपकारिणः ॥ एकविंशत् स गच्छेच्च नरकाणि क्रमेण वै। (ब्राह्मपर्व १९।५०-५१)
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