भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

खट्टे फल उनकी सेवामें नहीं चढ़ाने चाहिये। भगवान् विष्णुको खजूर, नारिकेल, मातुलुलुङ् अर्थात् बिजौरा आदि मधुर फलोंको समर्पित करना चाहिये। भगवान् मधुर फलोंसे प्रसन्न होते हैं। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भी इसी प्रकारके मधुर फल, वस्त्र, अन्न तथा सुवर्णका दान देना चाहिये।

इस प्रकार जो पुरुष चार मासतक व्रत करता है,

उसका तीन जन्मोंतक गार्हस्थ्य जीवन नष्ट नहीं होता और न तो ऐश्वर्यकी कमी होती है। जो स्त्री इस व्रतको करती है वह तीन जन्मोंतक न विधवा होती है न दुर्भगा और न पतिसे पृथक् ही रहती है।

इस व्रतके दिन अश्विनीकुमारोंकी भी पूजा करनी चाहिये। राजन्! इस प्रकार मैंने द्वितीया-कल्पका वर्णन किया है। (अध्याय २०)

तृतीया-कल्पका आरम्भ, गौरी-तृतीया-व्रत-विधान और उसका फल

सुमन्तु मुनिने कहा— राजन्! जो स्त्री सब प्रकारका सुख चाहती है, उसे तृतीयाका व्रत करना चाहिये। उस दिन नमक नहीं खाना चाहिये। इस विधिसे उपवासपूर्वक जीवनपर्यन्त इस व्रतका अनुष्ठान करनेवाली स्त्रीको भगवती गौरी संतुष्ट होकर रूप-सौभाग्य तथा लावण्य प्रदान करती हैं। इस व्रतका विधान जो स्वयं गौरीने धर्मराजसे कहा है, उसीका वर्णन मैं करता हूँ, उसे आप सुनें—

भगवती गौरीने धर्मराजसे कहा— धर्मराज! स्त्री-पुरुषोंके कल्याणके लिये मैंने इस सौभाग्य प्राप्त करानेवाले व्रतको बनाया है। जो स्त्री इस व्रतको नियमपूर्वक करती है, वह सदैव अपने पतिके साथ रहकर उसी प्रकार आनन्दका उपभोग करती है, जैसे भगवान् शिवके साथ मैं आनन्दित रहती हूँ। उत्तम पतिकी प्राप्तिके लिये कन्याको यह व्रत करना चाहिये। व्रतमें नमक न खाये। सुवर्णकी गौरी-प्रतिमा स्थापित करके भक्तिपूर्वक एकाग्रचित्त हो गौरीका पूजन करे। गौरीके लिये नाना प्रकारके नैवेद्य अर्पित करने चाहिये। रात्रिमें लवणरहित भोजन करके स्थापित गौरी-प्रतिमाके समक्ष ही शयन करे। दूसरे दिन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर दक्षिणा दे। इस प्रकार जो कन्या व्रत करती है, वह उत्तम पतिको प्राप्त करती है तथा चिरकालतक श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर अन्तमें

पतिके साथ उत्तम लोकोंको जाती है।

यदि विधवा इस व्रतको करती है तो वह स्वर्गमें अपने पतिको प्राप्त करती है और बहुत समयतक वहाँ रहकर पतिके साथ वहाँके सुखोंका उपभोग करती है एवं पूर्वोक्त सभी सुखोंको भी प्राप्त करती है। देवी इन्द्राणीने पुत्र-प्राप्तिके लिये इस व्रतका अनुष्ठान किया था, इसके प्रभावसे उन्हें जयन्त नामका पुत्र प्राप्त हुआ। अरुन्धतीने उत्तम स्थान प्राप्त करनेके लिये इस व्रतका नियम-पालन किया था, जिसके प्रभावसे वे पतिसहित सबसे ऊपरका स्थान प्राप्त कर सकी थीं। वे आजतक आकाशमें अपने पति महर्षि वसिष्ठके साथ दिखायी देती हैं। चन्द्रमाकी पत्नी रोहिणीने अपनी समस्त सपत्नियोंको जीतनेके लिये बिना लवण खाये इस व्रतको किया तो वे अपनी सभी सपत्नियोंमें प्रधान तथा अपने पति चन्द्रमाकी अत्यन्त प्रिय पत्नी हो गयीं। देवी पार्वतीकी अनुकम्पासे उन्हें अचल सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस प्रकार यह तृतीया तिथि-व्रत सारे संसारमें पूजित है और उत्तम फल देनेवाला है। वैशाख, भाद्रपद तथा माघ मासकी तृतीया अन्य मासोंकी तृतीयासे अधिक उत्तम है, जिसमें माघ मास तथा भाद्रपद मासकी तृतीया स्त्रियोंको विशेष फल देनेवाली है।

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