भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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  • ब्राह्मपर्व *

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अतः ब्रह्माके प्रयाससे भगवान् शङ्करने गणेशको उत्पन्न किया और उन्हें गणोंका अधिपति बनाया।

राजन्! जो प्राणी गणेशकी बिना पूजा किये ही कार्य आरम्भ करता है, उसके लक्षण मुझसे सुनिये—वह व्यक्ति स्वप्रमं अत्यन्त गहरे जलमें अपनेको डूबते, स्नान करते हुए या केश मुड़ाये देखता है। काषाय वस्त्रसे आच्छादित तथा हंसिक व्याघ्रादि पशुओंपर अपनेको चढ़ता हुआ देखता है। अन्त्यज, गर्दभ तथा ऊँट आदिपर चढ़कर परिजनोंसे घिरा वह अपनेको जाता हुआ देखता है। जो मानव केकड़ेपर बैठकर अपनेको जलकी तरंगोंके बीच गया हुआ देखता है और पैदल चल रहे लोगोंसे घिरकर यमराजके लोकको जाता हुआ अपनेको स्वप्रमं देखता है, वह निश्चित ही अत्यन्त दुःखी होता है।

जो राजकुमार स्वप्रमं अपने चित्त तथा आकृतिको विकृत रूपमें अवस्थित, करवीरके फूलोंकी मालासे विभूषित देखता है, वह उन भगवान् विघ्नेशके द्वारा विघ्न उत्पन्न कर देनेके कारण पूर्ववंशानुगत प्राप्त राज्यको प्राप्त नहीं कर पाता। कुमारी कन्या अपने अनुरूप पतिको नहीं प्राप्त कर पाती। गर्धिणी स्त्री संतानको नहीं प्राप्त कर पाती है। श्रोत्रिय ब्राह्मण आचार्यत्वका लाभ नहीं प्राप्त कर पाता और शिष्य अध्ययन नहीं कर पाता। वैश्यको व्यापारमें लाभ नहीं प्राप्त होता है और कृषकको कृषि-कार्यमें पूरी सफलता नहीं मिलती। इसलिये राजन्! ऐसे अशुभ स्वप्रोंको देखनेपर भगवान् गणपतिकी प्रसन्नताके लिये विनायक-शान्ति करनी चाहिये।

शुक्ल पक्षकी चतुर्थीके दिन, बृहस्पतिवार और पुष्य-नक्षत्र होनेपर गणेशजीको सर्वोषधि और सुगन्धित द्रव्य-पदार्थोंसे उपलिस करे तथा उन भगवान् विघ्नेशके सामने स्वयं भद्रासनपर बैठकर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराये। तदनन्तर

भगवान् शङ्कर, पार्वती और गणेशकी पूजा करके सभी पितरों तथा ग्रहोंकी पूजा करे। चार कलश स्थापित कर उनमें सप्तमृतिका, गुग्गुल और गोरोचन आदि द्रव्य तथा सुगन्धित पदार्थ छोड़े। सिंहसनस्थ गणेशजीको स्नान कराना चाहिये। स्नान कराते समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—

सहस्राक्षं शतधारमुषिभिः पावनं कृतम्। तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्यः पुनन्तु ते॥ भगं ते वरुणो राजा भगं सूर्यो बृहस्पतिः। भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददुः॥ यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि। ललाटे कर्णयोर्क्षणोरापस्तद्वन्नतु ते सदा॥

(ब्राह्मपर्व २३।१९—२१)

इन मन्त्रोंसे स्नान कराकर हवन आदि कार्य करे। अनन्तर हाथमें पुष्प, दूर्वा तथा सर्पप (सरसों) लेकर गणेशजीकी माता पार्वतीको तीन बार पुष्पाञ्जलि प्रदान करनी चाहिये। मन्त्र उच्चारण करते हुए इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—

रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि मे। पुत्रान् देहि धनं देहि सर्वान् कामांश्च देहि मे। अचलां बुद्धिं मे देहि धरायां ख्यातिमेव च॥

(ब्राह्मपर्व २३।२८)

अर्थात् 'हे भगवति! आप मुझे रूप, यश, तेज, पुत्र तथा धन दें, आप मेरी सभी कामनाओंको पूर्ण करें। मुझे अचल बुद्धि प्रदान करें और इस पृथ्वीपर प्रसिद्धि दें।'

प्रार्थनाके पश्चात् ब्राह्मणोंको तथा गुरुको भोजन कराकर उन्हें वस्त्र-युगल तथा दक्षिणा समर्पित करे। इस प्रकार भगवान् गणेश तथा ग्रहोंकी पूजा करनेसे सभी कर्मोंका फल प्राप्त होता है और अत्यन्त श्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। सूर्य, कार्तिकेय और विनायकका पूजन एवं तिलक करनेसे सभी सिद्धियोंकी प्राप्ति होती है। (अध्याय २३)

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