भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- ब्राह्मपर्व *
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दूर्वा, पुष्प, कुश, गन्ध, अक्षत और अनेक प्रकारके नैवेद्योंसे नागोंका पूजन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराये। ऐसा करनेपर उस पुरुषके कुलमें कभी सपोंका भय नहीं होता।
भाद्रपदकी पञ्चमीको अनेक रंगोंके नागोंको चित्रितकर घी, खीर, दूध, पुष्प आदिसे पूजनकर गुगुलकी धूप दे। ऐसा करनेसे तक्षक आदि नाग प्रसन्न होते हैं और उस पुरुषकी सात पीढ़ीतकको सोंपका भय नहीं रहता।
आश्विन मासकी पञ्चमीको कुशका नाग
बनाकर गन्ध, पुष्प आदिसे उनका पूजन करे। दूध, घी, जलसे स्नान कराये। दूधमें पके हुए गेहूँ और विविध नैवेद्योंका भोग लगाये। इस पञ्चमीको नागकी पूजा करनेसे वासुकि आदि नाग संतुष्ट होते हैं और वह पुरुष नागलोकमें जाकर बहुत कालतक सुखका भोग करता है। राजन्! इस पञ्चमी तिथिके कल्पका मैंने वर्णन किया। जहाँ 'ॐ कुरुकुल्ले फट् स्वाहा'—यह मन्त्र पढ़ा जाता है, वहाँ कोई सर्प नहीं आ सकता१।
(अध्याय ३६—३८)
षष्ठी-कल्प-निरूपणमें स्कन्द-षष्ठी-व्रतकी महिमा
सुमन्तु मुनि बोले—राजन्! अब मैं षष्ठी तिथि-कल्पका वर्णन करता हूँ। यह तिथि सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली है। कार्तिक मासकी षष्ठी तिथिको फलाहारकर यह तिथिव्रत किया जाता है२। यदि राज्यच्युत राजा इस व्रतका अनुष्ठान करे तो वह अपना राज्य प्राप्त कर लेता है। इसलिये विजयकी अभिलाषा रखनेवाले व्यक्तिको इस व्रतका प्रयत्न-पूर्वक पालन करना चाहिये।
यह तिथि स्वामिकार्तिकेयको अत्यन्त प्रिय है। इसी दिन कृतिकाओंके पुत्र कार्तिकेयका आविर्भाव हुआ था। वे भगवान् शङ्कर, अग्नि तथा गङ्गाके भी पुत्र कहे गये हैं। इसी षष्ठी तिथिको स्वामिकार्तिकेय देवसेनाके सेनापति हुए। इस तिथिको व्रत कर घृत, दही, जल और पुष्पोंसे स्वामिकार्तिकेयको दक्षिणकी ओर मुख कर अर्घ्य देना चाहिये।
अर्घ्यदानका मन्त्र इस प्रकार है—
समर्षिदारज स्कन्द स्वाहापतिसमुद्भव। रुद्रार्यमाग्निज विभो गङ्गागर्भ नमोऽस्तु ते। प्रियतां देवसेनानीः सम्पादयतु हृदतम्॥
(ब्राह्मपर्व ३९।६)
ब्राह्मणको अन्न देकर रात्रिमें फलका भोजन और भूमिपर शयन करना चाहिये। व्रतके दिन पवित्र रहे और ब्रह्मचर्यका पालन करे। शुक्ल-पक्ष तथा कृष्णपक्ष—दोनों षष्ठियोंको यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतके करनेसे भगवान् स्कन्दकी कृपासे सिद्धि, धृति, तुष्टि, राज्य, आयु, आरोग्य और मुक्ति मिलती है। जो पुरुष उपवास न कर सके, वह रात्रि-व्रत ही करे, तब भी दोनों लोकोंमें उत्तम फल प्राप्त होता है। इस व्रतको करनेवाले पुरुषको देवता भी नमस्कार करते हैं और वह इस लोकमें आकर चक्रवर्ती राजा होता है। राजन्! जो पुरुष षष्ठी-व्रतके माहात्म्यका भक्तिपूर्वक श्रवण
१-कश्मीर नागोंका देश माना जाता है। 'नीलमतपुराण' में इसका विस्तृत वर्णन है।
२-पञ्चाङ्गोंके अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ला षष्ठीको स्कन्द-षष्ठी होती है तथा कार्तिक शुक्ला षष्ठीको रवि-षष्ठी मानी जाती है, जिस दिन सम्पूर्ण भारतमें सूर्योपासना होती है। परंतु यहाँ कार्तिक शुक्ला षष्ठीके रूपमें वर्णन आया है, यह गणना अमान्तमास (अमावास्याको पूर्ण होनेवाले मास)-के अनुसार प्रतीत होती है।
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