भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • ब्राह्मपर्व *

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आश्विन आदि चार मासोंमें अगस्त्य-पुष्प, अपराजित धूप और गुड़के पूए आदिका नैवेद्य तथा इक्षुरस भगवान् सूर्यको समर्पित करना चाहिये। यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराकर आत्मशुद्धिके लिये कुशाके जलसे स्नान करना चाहिये। उस दिन कुशोदकका ही प्राशन करे। व्रतकी समाप्तिमें माघ मासकी शुक्ला सप्तमीको रथका दान करे और सूर्यभगवान्की प्रसन्नताके लिये रथयात्रोत्सवका आयोजन करे। महापुण्यदायिनी इस सप्तमीको रथसप्तमी कहा गया है। यह महासप्तमीके नामसे अभिहित है। रथसप्तमीको जो उपवास करता है,

वह कीर्ति, धन, विद्या, पुत्र, आरोग्य, आयु और उत्तमोत्तम कान्ति प्राप्त करता है। हे पुत्र! तुम भी इस व्रतको करो, जिससे तुम्हारे सभी अभीष्टोंकी सिद्धि हो। इतना कहकर शङ्ख, चक्र, गदा-पद्मधारी श्रीकृष्ण अन्तर्हित हो गये।

सुमन्तुने कहा— राजन्! उनकी आज्ञा पाकर साम्बने भी भक्तिपूर्वक सूर्यनारायणकी आराधनामें तत्पर हो रथसप्तमीका व्रत किया और कुछ ही समयमें रोगमुक्त होकर मनोवाञ्छित फल प्राप्त कर लिया*।

(अध्याय ५०-५१)

सूर्यदेवके रथ एवं उसके साथ भ्रमण करनेवाले देवता-नाग आदिका वर्णन

राजा शतानीकने पूछा—मुने! सूर्यनारायणकी रथयात्रा किस विधानसे करनी चाहिये। रथ कैसा बनाना चाहिये? इस रथयात्राका प्रचलन मृत्युलोकमें किसके द्वारा हुआ? इन सब बातोंको आप कृपाकर मुझे बतलायें।

सुमन्तु मुनि बोले— राजन्! किसी समय सुमेरु पर्वतपर समासीन भगवान् रुद्रने ब्रह्माजीसे पूछा—‘ब्रह्मन्! इस लोकको प्रकाशित करनेवाले भगवान् सूर्य किस प्रकारके रथमें बैठकर भ्रमण करते हैं, इसे आप बतायें।’

ब्रह्माजीने कहा— त्रिलोचन! सूर्यनारायण जिस प्रकारके रथमें बैठकर भ्रमण करते हैं, उसका मैं वर्णन करता हूँ, आप सानन्द सुनें।

एक चक्र, तीन नाभि, पाँच अरे तथा स्वर्णमय अति कान्तिमान् आठ बन्धोंसे युक्त एवं एक

नेमिसे सुसज्जित—इस प्रकारके दस हजार योजन लम्बे-चौड़े अतिशय प्रकाशमान स्वर्ण-रथमें विराजमान भगवान् सूर्य विचरण करते रहते हैं। रथके उपस्थसे ईषा-दण्ड तीन-गुना अधिक है। यहाँ उनके सारथि अरुण बैठते हैं। इनके रथका जुआ सोनेका बना हुआ है। रथमें वायुके समान वेगवान् छन्दरूपी सात घोड़े जुते रहते हैं। संवत्सरमें जितने अवयव होते हैं, वे ही रथके अङ्ग हैं। तीनों काल चक्रकी तीन नाभियाँ हैं। पाँच ऋतुएँ अरे हैं, छठी ऋतु नेमि है। दक्षिण और उत्तर—ये दो अयन रथके दोनों भाग हैं। मुहूर्त रथके इषु, कला, शम्य, काष्ठाएँ रथके कोण, क्षण अक्षदण्ड, निमेष रथके कर्ण, ईषा-दण्ड लव, रात्रि वरूथ, धर्म रथका ध्वज, अर्थ और काम धुरीका अग्रभाग, गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्, पंक्ति, बृहती तथा उष्णिक—

  • रथसप्तमीके विषयमें व्रतरत्नाकर, व्रतकल्पद्रुम, व्रतराज आदिके अतिरिक्त पद्मपुराण एवं वायुपुराणके माघ-माहात्म्यमें बहुत विस्तारसे व्रत-विधानका निरूपण हुआ है और कुछ पञ्चाङ्गोंमें भी इसी दिन भगवान् सूर्यके रथपर चढ़कर आकाशकी प्रथम यात्रा करनेका उल्लेख किया गया है। जैसे रामनवमीके दिन भगवान् रामका, जन्माष्टमीके दिन भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य मानकर उत्सव किया जाता है, वैसे ही रथसप्तमीके दिन भगवान् सूर्यका प्राकट्य मानकर उनके लिये व्रत-उपवासके साथ विशेष अर्चा सम्पन्न की जाती है।

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