भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जीवन है। इन्हींसे जगत्की उत्पत्ति होती है और अन्तमें इन्हींमें सारी सृष्टि विलीन हो जाती है। ध्यान करनेवाले इन्हींका ध्यान करते हैं तथा ये मोक्षकी इच्छा रखनेवालोंके लिये मोक्षस्वरूप हैं। यदि सूर्यभगवान् न हों तो क्षण, मुहूर्त, दिन, रात्रि, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, वर्ष तथा युग आदि काल-विभाग हो ही नहीं और काल-विभाग न होनेसे जगत्का कोई व्यवहार भी नहीं चल सकता। ऋतुओंका विभाग न हो तो फिर फल-फूल, खेती, ओषधियाँ आदि कैसे उत्पन्न हो सकती हैं? और इनकी उत्पत्तिके बिना प्राणियोंका जीवन भी कैसे रह सकता है? इससे यह स्पष्ट है कि इस (चराचरात्मक) विश्वके मूलभूत कारण भगवान्
सूर्यनारायण ही हैं। सूर्यभगवान् वसन्त-ऋतुमें कपिलवर्ण, ग्रीष्ममें तप्त सुवर्णके समान, वर्षामें श्वेत, शरद्-ऋतुमें पाण्डुवर्ण, हेमन्तमें ताम्रवर्ण और शिशिर-ऋतुमें रक्तवर्णके होते हैं। इन वर्णोंके अलग-अलग फल हैं। रुद्र! उसे आप सुनें।
यदि सूर्यभगवान् (असमयमें) कृष्णवर्णके हों तो संसारमें भय होता है, ताम्रवर्णके हों तो सेनापतिके नाश होता है, पीतवर्णके हों तो राजकुमारकी मृत्यु, श्वेतवर्णके हों तो राजपुरोहितका ध्वंस और चित्र अथवा धूम्रवर्णके होनेसे चोर और शस्त्रका भय होता है, परंतु ऐसा वर्ण होनेके अनन्तर यदि वृष्टि हो जाती है तो अनिष्ट फल नहीं होते।
(अध्याय ५४)
भगवान् सूर्यका अभिषेक एवं उनकी रथयात्रा
रुद्रने पूछा—ब्रह्मन्! भगवान् सूर्यकी रथयात्रा कब और किस विधिसे की जाती है? रथयात्रा करनेवाले, रथको खींचनेवाले, रथको वहन करनेवाले, रथके साथ जानेवाले और रथके आगे नृत्य-गान करनेवाले एवं रात्रि-जागरण करनेवाले पुरुषोंको क्या फल प्राप्त होता है? इसे आप लोककल्याणके लिये विस्तारपूर्वक बताइये।
ब्रह्माजी बोले—हे रुद्र! आपने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। अब मैं इसका वर्णन करता हूँ, आप इसे एकाग्र-मनसे सुनें।
भगवान् सूर्यकी रथयात्रा और इन्द्रोत्सव—ये दोनों जगत्के कल्याणके लिये मैंने प्रवर्तित किये हैं। जिस देशमें ये दोनों महोत्सव आयोजित किये जाते हैं, वहाँ दुर्गिष्ठ आदि उपद्रव नहीं होते और न चोरी आदिका कोई भय ही रहता है। इसलिये दुर्गिष्ठ, अकाल आदि उपद्रवोंकी शान्तिके लिये
इन उत्सवोंको मनाना चाहिये। मार्गशीर्षके शुक्ल पक्षकी सप्तमीको घृतके द्वारा भगवान् सूर्यको श्रद्धापूर्वक स्नान कराना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष सोनेके विमानमें बैठकर अग्निलोकको जाता है और वहाँ दिव्य भोग प्राप्त करता है। जो व्यक्ति शर्कराके साथ शालि-चावलका भात, मिष्ठान और चित्रवर्णके भातको भगवान् सूर्यको अर्पित करता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है। जो प्रतिदिन भगवान् सूर्यको भक्तिपूर्वक घृतका उबटन लगाता है, वह परम गतिको प्राप्त करता है।
पौष शुक्ल सप्तमीको तीर्थोंके जल अथवा पवित्र जलसे वेदमन्त्रोंके द्वारा भगवान् सूर्यको स्नान कराना चाहिये। सूर्यभगवान्के अभिषेकके समय प्रयाग, पुष्कर, कुरुक्षेत्र, नैमिष, पृथूदक (पेहवा), शोण, गोकर्ण, ब्रह्मवर्त, कुशावर्त, बिल्वक, नीलपर्वत, गङ्गाद्वार, गङ्गासागर, कालप्रिय
- इस विषयका बृहद् वर्णन 'बृहत्संहिता' की भट्टोत्पली टीका आदिमें है। विशेष जानकारीके लिये उन्हें देखा जा सकता है।
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