भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११४ भोजप्रबन्धः 'कूर्मः पाताल गङ्गापयसि विहरतां तत्तटीरूढमुस्ता- मादत्तामादिपोत्री शिथिलयतु फणामण्डलं कुण्डलीन्द्रः। दिङ्मातङ्गा मृणालीकवलनां कुर्वतांपर्वतेन्द्राः सर्वे स्वैरं चरन्तु त्वयि वहति विभो भोज देवीं धरित्रीम्' ॥२२७॥ राजा चमत्कृतस्तस्मै शताश्वान्ददौ । ततो भाण्डारिको लिखति- 'क्रीडोद्याने नरेन्द्रेण शतमश्वा मनोजवाः। प्रदत्ताः कामदेवाय सहकारतरोरधः' ॥ २२८ ॥ तदनंतर वे ब्राह्मण अलग-अलग आशीर्वाद कहकर क्रमानुसार राजा की आज्ञासे कंबल पर बैठ कर मंगल पाठ करने लगे । तब एक ने पढ़ाः- हे प्रभु भोजराज, धरती का बोझ आप के उठा लेने पर ( अब ) कच्छप पाताल गंगा में विहार करे, उसके किनारे पर उगे मोथे को आदि वाराह ग्रहण करे, शेषनाग फणमंडल को शिथिल कर ले, दिङ्नाग (दिशाओं को धारण करने वाले हाथी) कमल, नालों की जुगाली करें और सब पर्वत स्वच्छंदतापूर्वक विचरण करें। (भोज के पृथ्वी वहन करलेने से सब मुक्त हैं।) चमत्कृत हो राजा ने उसे सौ घोड़े दिये । तो भंडारी ने लिखा- राजा ने क्रीडा-वाटिका में आम्रवृक्षके नीचे मन के समान वेगवाले सौ घोड़े कामदेव को दिये। ───:०:─── ( १७ ) भोजस्य दर्पभङ्ग : ततः कदाचिद्भोजो विचारयति स्म - 'मत्सदृशो वदान्यः कोऽपि नास्ति' इति। तद्गर्वं विदित्वा मुख्यामात्यो विक्रमार्कस्य पुण्यपत्रं भोजाय प्रदर्शयामास । भोजस्तत्र पत्रे किञ्चित्प्रस्तावमपश्यत् । तथाहि—विक्र- मार्कः पिपासया प्राह— स्वच्छं सज्जनचित्तवल्लघुतरं दीनार्तिवच्छीतलं पुत्रालिङ्गनवत्तथैव मधुरं तद्बाल्यसञ्जल्पवत् । एलोशीर लवङ्ग चन्दनलसत्कर्पूरकस्तूरिका जातीपाटलिकेतकैः सुरभितं पानीयमानीयताम्' ॥ २२६ ॥