भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 190 में से

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११६ भोजप्रबन्धः तुम कमनीय हो, अत्यंत मधुर हो, रस तुझसे टपका जा रहा है, और क्या कहें कि तुम पंचशर काम के अद्वितीय धनुष हो; हे गन्ने, तुम में सब कुछ है, पर एक कमी है कि सेवित होने पर (चूसे जाने पर) धीरे-धीरे नीरसता को प्राप्त हो जाते हो। राजा ने कवि के हृदय को समझ कर कविमयूर को सम्मानित किया। ततः कदाचिद्रात्रौ सौधोपरि क्रीडापरो राजा शशाङ्कमालोक्य प्राह- 'यदेतच्चन्द्रान्तर्जलदलवलीलां वितनुते तदाचष्टे लोकः शशक इति नो मां प्रति तथा।' ततश्चाधो भूमौ सौधान्तः प्रविष्टः कश्चिच्चोर आह- 'अहं त्विन्दुं मन्ये त्वदरिविरहाक्रान्ततरुणी- कटाक्षोल्कापातव्रणकणकलङ्काङ्किततनुम्' ॥२३६॥ कभी रात में महल के ऊपर क्रीडारत राजा ने (चन्द्रमा के) शशचिह्न को देखकर कहा- 'यह जो चन्द्रमा के मध्य मेघखंड जैसी कुछ प्रतीति है, लोक उसे शशक कहता है किंतु मुझे ऐसा नहीं लगता। तो नीचे के तलमें महल के भीतर घुसा कोई चोर बोला- मैं तो समझता हूँ आपके वैरियों की विरह पीडिता तरुणियों के कटाक्षों के कारण जो उल्कापात होता है, उसी से हुए घाव के कलंक का यह चिह्न चन्द्रमा के शरीर में है। राजा तच्छ्रुत्वा प्राह--'अहो महाभाग, कस्त्वमर्धरात्रे कोशगृहमध्ये तिष्ठसि' इति। स आह-'देव, अभयं नो देहि' इति। राजा--'तथा' इति। ततो राजानं स चोरः प्रणम्य स्ववृत्तान्तमकथयत्। तुष्टो राजा चोराय दश कोटीः सुवर्णस्योन्मत्तान्गजेन्द्रांश्च ददौ। यह सुनकर राजा बोला- हे महाभाग, कोषागर के मध्य आधीरात में घुसे तुम कौन हो?' वह बोला-महाराज, मुझे अभय दीजिए।' राजा ने कहा--ठीक है।' तब राजा को प्रणाम करके चोर ने अपनी वार्ता कह डाली। संतुष्ट राजा ने चोर को सोने की दस कोटियाँ और मदमाते गजराज दिये। ततः कोषाधिकारी धर्मपत्रे लिखति-

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