भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 190 में से

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पृष्ठ 153

१५० भोजप्रबन्धः तो वह बच्चा रोया नहीं और प्रसन्न मुख रहा और वह स्त्री ध्यान में लीन रही । तदनंतर स्वेच्छया स्वामी के जाग उठने पर उसने झट से बच्चे को ले लिया । धर्म की उस परमता को देख आश्चर्य में पड़े नरपति ने कहा—'अरे, मेरे जैसा भाग्य किसका है कि ऐसी पुण्यस्त्रियां मेरे नगर में निवास करती हैं !' ततः प्रातः सभायामागत्य सिंहासन उपविष्टो राजा कालिदासं प्राह—'सुकवे, महदाश्चर्यं मया पूर्वेद्यू रात्रौ दृष्टमस्ति' इत्युक्त्वा राजा पठति—'हुताशनश्चन्दनपङ्कशीतलः' । तत्पश्चात् प्रातः काल सभा में आकर सिंहासन पर बैठे राजा ने कालिदास से कहा--'हे सुकवि, बीती रात मैंने एक बड़ा आश्चर्य देखा है;' यह कहकर राजा ने पढ़ा—'चंदन-लेप-समान सुशीतल आग हो गयी ।' कालिदासस्ततश्चरणत्रयं झटिति पठति— 'सुतं पतन्तं प्रसमीक्ष्य पावके न बोधयामास पतिं पतिव्रता । तदाभवत्तत्पतिभक्तिगौरवाद्वहुताशनश्चन्दनपङ्कशीतलः' ॥ २६२ ॥ राजा च स्वाभिप्रायमालोक्य विस्मितस्तमालिङ्गय पादयोः पतति स्म । तो कालिदास ने झट से श्लोक के शेष तीन चरण पढ़ दिये-- 'बच्चा गिरता देख आग में पतिव्रता ने पति को नहीं जगाया । रखने को पति-भक्ति-मान चंदन-लेप समान सुशीतल आग हो गयी । और अपना अभिप्राय पूर्ण देख राजा ने विस्मित हो उसका आलिंगन किया और चरणों में गिर पड़ा । एकदा ग्रीष्मकाले राजान्तःपुरे विचरन्धर्मतापतप्त आलिङ्गनादिकम- कुर्वंस्ताभिः सह सरससंलापाद्युपचारमनुभूय तत्रैव सुप्तः । ततः प्रातरु- त्थाय राजा सभां प्रविष्टः कुतूहलात्पठति— 'मरुदागमवार्तयापि शून्ये समये जाग्रति सम्प्रवृद्ध एव ।' एक बार ग्रीष्म ऋतु में राजा रनिवास में विचर रहा था; ग्रीष्म ऋतु की धूप के ताप से तप्त होने के कारण आलिंगन-आदि न करके वह रानियों से रस पूर्ण वार्तालाप आदि में आनन्द उठाता वहीं सो गया । फिर प्रातःकाल उठकर सभा में पहुँच कर राजा ने कुतूहल के कारण पढ़ा—