भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ भोजप्रबन्धः तक उन जामुनों को 'गुड़् प्-गुड़् प्' करके गिरती देखता राजा थकावट वीत जाने पर उठकर घोड़े पर चढ़ चला गया । ततः सभायां राजा पूर्वानुभूतकपिचलितफलपतनरवमनुकुर्वन्सम- स्यामाह- 'गुलुगुग्गुलुगुग्गुलु' । तत आह कालिदासः- 'जम्बूफलानि पक्वानि पतन्ति विमले जले । कपिकम्पितशाखाभ्यो गुलुगुग्गुलुगुग्गुलु' ॥ २६५ ॥ तो सभा में पहिले अनुभूत बंदरों द्वारा झाड़ी जाने से हुए जामुनों के गिरने के ( 'गुड़् प्-गुड़् प्' ) शब्द का अनुकरण करते हुए राजा ने एक समस्या कही- 'गुलुगुग्गुलुगुग्गलु' । तो कालिदास ने कहा- वानरदल के द्वारा कंपित शाखाओं से निर्मल जल में-पके हुए गिरते जंबूफल 'गुलु गुग्गुलु-गुग्गुलुगुग्गुलु ।' राजा तुष्ट आह- 'सुकवे, अदृष्टमपि परहृदयं कथं जानासि । साक्षा- च्छारदासि' इति मुहुर्मुहुः पादयोः पतति स्म । संतुष्ट हो राजा ने कहा- 'हे सुकवि, तुम अनदेखे भी दूसरे के हृदय को कैसे जान लेते हो ? तुम साक्षात् शारदा हो,' और पैरों पर गिर पड़ा । एकदा धारानगरे प्रच्छन्नवेषो विचरन्कस्यचिद्वृद्धब्राह्मणस्य गृहं राजा मध्याह्नसमये गच्छंस्तत्र तिष्ठति स्म । तदा वृद्धविप्रो वैश्वदेवं कृत्वा काकवलिं गृह्णन्गृहान्निर्गत्य भूमौ जलशुद्धायां निक्षिप्य काकमाह्वयति स्म । तत्र हस्तचिस्फोटालनेन हाहेतिशब्देन च काकाः समायाताः । तत्र कश्चित्का- कस्तारं रारटीति स्म । तच्छ्रुत्वा तत्पत्नी तरुणी भीतेव हस्तं निजोरसि निधाय 'अये मातः' इति चक्रन्द । एक बार धारा नगर में गुप्त वेष में विचरण करता हुआ राजा किसी ब्राह्मण के घर में दोपहरी के समय जाते हुए ठहरा हुआ था । उस समय बूढ़ा ब्राह्मण 'वैश्वदेव' ( देवताओं के निमित्त प्रातः सायम्, विशेषतः मध्याह्न समर्पित खाद्य सामग्री-वलिवैश्वदेव कर्म ) करके कौओं के निमित्त वलि लेकर घर से निकला और ( वलि को ) जल से स्वच्छ की गई भूमि पर रखकर कौए को बुलाने लगा । तालियां बजाने और