भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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भोजप्रबन्धः ६ राम तीनों लोकों के राजा थे और वसिष्ठ ब्रह्मपुत्र । उन्होंने राम-राज्या- भिषेक के अवसर पर मुहूर्त तो बताया ही था । उस मुहूर्त-शोधन के फलस्वरूप राम को अपनी धरती से रहित हो वन पहुँचे, सीता का अपहरण हुआ और विरंचि ( ब्रह्मा ) के पुत्र का वचन व्यर्थ हुआ । हे राजश्रेष्ठ, यह कौन न कुछ जाननेवाला, पेटपालू उत्पन्न हो गया, जिसके कहने से कामदेव के समान कुमार को आप मार डालना चाहते हैं ? किञ्च—किं नु मे स्यादिदं कृत्वा किं नु मे स्यादकुर्वतः । इति सञ्चिन्त्य मनसा प्राज्ञः कुर्वीत वा न वा ॥ २३ ॥ उचितमनुचितं वा कुर्वता कार्यजातं परिणतिरवधार्या यत्नतः पण्डितेन । अतिरभसकृतानां कर्मणामाविपत्ते— र्भवति हृदयदाही शल्यतुल्यो विपाकः ॥ २४ ॥ अधिक क्या कहूँ—यह करके मेरा क्या होगा और न करके क्या होगा, यह भली भाँति विचार करके बुद्धिमान् नर को करना अथवा न करना उचित है । उचित अथवा अनुचित किसी कार्य को करते समय पंडित मनुष्य को प्रयत्न पूर्वक उसके परिणाम का विचार कर लेना चाहिए । जो कार्य अत्यंत शीघ्रता में कर लिये जाते हैं, उनका फल विपत्तियों से परिपूर्ण और बाण के समान हृदय में गड़ कर दाह उत्पन्न करनेवाला होता है । किञ्च—येन सहासितमशितं हसितं कथितं च रहसि विश्रब्धम् । तं प्रति कथमसतामपि निवर्तते चित्तमाममरणात् ॥ २५ ॥ और क्या कहूँ—जिसके साथ बैठे, खाया-पिया, हँसी-दिल्लगी की, एकांत में विश्वासपूर्वक कहा-सुना, उससे तो दुष्टों का भी मन मरण पर्यंत किसी दशा में नहीं हट पाता । किञ्च—अस्मिन् हते वृद्धस्य राज्ञः सिन्धुलस्य परमप्रीतिपात्राणि महावीरास्तवैवानुमते स्थिताः, ते त्वन्नगरमुल्लोलकल्लोलाः पयोधरा इव प्लावयिष्यन्ति । चिराद्बद्धमूलेऽपि त्वयि प्रायः पौरा भोजं भुवो भर्तारं भावयन्ति । किञ्च—सत्यपि च सुकृतकर्मणि दुर्नीतिश्चेच्छ्रियं हरत्येव ।