भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभोजप्रबन्धः १७५ यह सुनकर इंद्र ने निकट स्थित अश्विनी कुमारों से कहा—'हे स्वर्ग के वैद्यों क्या धन्वंतरि का शास्त्र (आयुर्वेद) असत्य है?' तो वे बोले—'हे देवराज महाराज, यह शास्त्र झूठा नहीं है, किंतु भोज ऐसे रोग से ग्रस्त है, जिसका ज्ञान देवों को ही है।' इंद्र ने कहा—'यह कौन-सा असाध्य रोग है, क्या आप दोनों को ज्ञात है?' तो उन दोनों ने कहा—'देव भोज ने कपाल- शोधन किया था, तभी एक मछली का बच्चा घुस गया। इस रोग की जड़ में वही है।' तो मुस्कराते हुए इंद्र ने कहा—'तो आप दोनों शीघ्र जाओ, नहीं तो अद्य से भूलोक में भिषक्-शास्त्र मिथ्या सिद्ध हो जायेगा। राजा भोज सरस्वती की विलासलीला का निकेतन और शास्त्रों का उद्धारक कर्ता है।' ततः सुरेंद्रादेशेन तावुभावपि धृतद्विजन्मवेषौ धारानगरं प्राप्य द्वारस्थं प्राहुतुः—'द्वारस्थ, आवां भिषजौ काशीदेशादागतौ। श्रीभोजाय विज्ञापय। तेनानृतमित्यङ्गीकृतं वैद्यशास्त्रमिति श्रुत्वा तत्प्रतिष्ठापनाय तद्रोगनिवारणाय च' इति। ततो द्वारस्थः प्राह--'भो विप्रौ, न कोऽपि भिषक्प्रवरः प्रवेष्टव्य इति राज्ञोक्तम्। राजा तु केवलमस्वस्थः। नायम- वसरो विज्ञापनस्य' इति। तस्मिन्क्षणे कार्यवशाद्बहिर्निर्गतो बुद्धिसाग- रस्तौ दृष्ट्वा 'कौ भवन्तौ' इत्यपृच्छत्। ततस्तौ यथागतमूचतुः। ततो बुद्धिसागरेण तौ राज्ञः समीपं नीतौ। तो सुरराज के आदेश से वे दोनों ब्राह्मण का वेष-धारण करके धारानगरी पहुँच कर द्वारपाल से बोले—'हे द्वारपाल, हमदोनों काशी देश से आये वैद्य हैं। श्री भोज को सूचना दो। उन्होंने यह मान लिया है कि वैद्यशास्त्र मिथ्या है; हम यह सुनकर उसकी पुनः प्रतिष्ठा करने और उनका रोग दूर करने आये हैं।' तो द्वारपाल बोला—'ब्राह्मणो, राजा ने कहा है कि किसी वैद्यवर को भीतर मत भेजो। राजा तो बस अस्वस्थ हैं, सूचना देने का यह अवसर नहीं है।' उसी क्षण किसी कार्य के वश बाहर आये बुद्धिसागर ने उन्हें देखकर पूछा—'आप दोनों कौन हैं?' तो उन्होंने जैसा पहिले कहा था, बता दिया। तो बुद्धिसागर उन दोनों को राजा के पास ले गया। ततो राजा ताववलोक्य मुखश्रियाऽमानुषाविति बुद्ध्वा 'आभ्यां शक्यतेऽयं रोगो निवारयितुम्' इति निश्चित्य तौ बहु मानितवान्।