भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)
Bhoja Prabandha with Hindi Commentary
बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा
पृष्ठ 180, कुल 190 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्रान्तरे राजा मध्ये 'मानुषाः' इति संबोधनँ श्रुत्वा 'वयं चेन्मानुषाः, कौ युवाम्' इति तयोर्हस्तौ झटिति स्वहस्ताभ्यामग्रहीत् । ततस्तत्क्षणएव तावन्तर्द्धानं ब्रुवन्तावेव 'कालिदासेन पूरणीयं तुरीयचरणम्' इति । ततो राजा विस्मितः सर्वानाहूय तद्वृत्तमब्रवीत् । तच्छ्रुत्वा सर्वेऽपि चम- त्कृता विस्मिताश्च बभूवुः । इस कथन के बीच राजा ने 'मानुषों' यह संबोधन सुनकर कहा- 'यदि हम मानुष हैं तो तुम दोनों कौन हो'—और झट से अपने हाथों से उन दोनों के दोनों हाथों को पकड़ लिया। तो वे दोनों 'चौथे चरण की पूर्ति कालिदास द्वारा होगी', कहते हुए उसी क्षण अंतर्धान होगये । तो विस्मित हुए राजा ने सब को बुलाकर वह हाल कहा। उसे सुनकर सभी चमत्कृत और विस्मित हुए। ततः कालिदासेन तुरीयचरणं पूरितम्— 'स्निग्धमुष्णं च भोजनम्' ॥ ३२२ ॥ इति। ततो भोजोऽपि कालिदासं लीलामानुषं मत्वा परं सम्मानितवान्। अथ राजनृपालः प्रतिदिनं संजातबलकान्तिर्ववृधे धाराधीशः कृष्णेतरपक्षे चन्द्र इव । तो कालिदास ने चौथा चरण पूरा किया— 'चिकना गरम-गरम भोजन।' तो भोज ने भी कालिदास को लीला मानुष (मनुष्य की लीला करनेवाला देव) मानकर परम संमान किया । तदनंतर धारा के अधीश्वर नृपाल भोज बल और कांति पाकर उसी प्रकार स्वास्थ्य वृद्धि को प्राप्त करने लगे जिस प्रकार कि उजाले पाख में चंद्रमा बढ़ता है। (३५) गाथासनाथा वीठिका ततः कदाचित्सिंहासनमलंकुर्वाणे श्रीभोजे कालिदास-भवभूति-दण्डि- बाण-मयूर-वररुचि-प्रभृतिकवितिलककुलालंकृतायां सभायां द्वारपाल १२ भो०