भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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पृष्ठ 20

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१२ भोजप्रबन्धः ततो गृहीते भोजे लोकाः कोलाहलं चक्रुः । हुम्भावश्च प्रवृत्तः । 'किं किम्' इति ब्रुवाणा भटा विक्रोशन्त आगत्य सहसा भोजं वधाय नीतं ज्ञात्वा हस्तिशालामुष्ट्रशालां वाजिशालां रथशालां प्रविश्य सर्वाञ्जघ्नुः। ततः प्रतोलीषु राजभवनप्राकारवेदिकासु बहिर्द्वारविटङ्केषु पुरसमीपेषु भेरीपटहमुरजमड्डुकडिण्डिमाननडाडम्बरं विडम्बितमभूत् । केचिद्विम- लासिना केचिद्विषेण केचित्कुन्तेन केचित्पाशेन केचिद्वह्निना केचित्परशुना केचिद्गलेन केचित्तोमरेण केचित्प्रासेन केचिदम्भसा केचिद्धारायां ब्राह्मणा योषितो राजपुत्रा राजसेवका राजानः पौराश्च प्राणपरित्यागं दधुः । तदनंतर भोज के पकड़ कर ले जाये जाने पर लोग कोलाहल करने लगे । हुङ्कार होने लगा । 'क्या हुआ, क्या हुआ' ऐसा कहते चिल्लाते हुए योद्धाओं ने आकर, अकस्मात् भोज को वध के निमित्त लेजाया गया जानकर, हस्तिशाला, उष्ट्रशाला, अश्वशाला, रथशाला में घुस कर सब को मार डाला । तत्पश्चात् गलियों में, राजमहल के प्राचीर की वेदियों पर, बाहरी द्वारों के चबूतरों पर, नगर के निकट स्थानों पर नगाड़ों, ढोलकियों, मृदङ्गों, डोलों और दौड़ियों के तीव्र घोष से आकाश गूँज उठा । ब्राह्मणों की स्त्रियों, राजपुत्रों, राजसेवकों, राजाओं और पुरजनों ने—कुछ ने चमकती तलवार से, कुछ ने विष के द्वारा, कुछ ने भाले से, कुछ ने रस्सी में फाँसी लगा, कुछ ने आग में जल, कुछ ने फरसे द्वारा, कुछ ने बरछी से, कुछ ने तोमर द्वारा, कुछ ने खाँड़े से, कुछ ने कुएँ और कुछ ने नदी में डूबकर—प्राणों का त्याग कर दिया । ततः सावित्रीसंज्ञा भोजस्य जननी विश्वजननीव स्थिता दासीमुखा- त्स्वपुत्रस्थितिमाकर्ण्य कराभ्यां नेत्रे पिधाय रुदती प्राह—'पुत्र, पितृव्येन कां दशां गमितोऽसि । ये मया नियमा उपवासाश्च त्वत्कृते कृताः, तेऽद्य मे विफला जाताः । दशापि दिशामुखानि शून्यानि । पुत्र, देवेन सर्वज्ञेन सर्वशक्तिनासृष्टाः श्रियः । पुत्र, एतं दासीवर्गं सहसा विच्छिन्नशिरसं पश्य' इत्युक्त्वा भूमावपतत् । तदनंतर संसार की माता के समान स्थित सावित्री नाम की भोज की माता दासी के मुख से अपने पुत्र की दशा सुनकर हाथों से नेत्रों को ढक कर रोती हुई कहने लगी—'पुत्र, चाचा ने तुम्हें किस दशा को पहुँचा दिया ।