भारतकोश
भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

भोज प्रबन्ध (राजा भोज, धारा नगरी एवं विद्वन्मण्डल इतिहास)

Bhoja Prabandha with Hindi Commentary

बल्लाल सेन / पं. जगदीशलाल शास्त्री द्वारा

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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१६ भोजप्रबन्धः चाहे स्वस्थ रहे, चाहे पड़ा रहे, चाहे सोता रहे, चाहे किसी के साथ हँसी करता रहे। (हे भाई, ) तुम जाति, आयु और रूप में अपने समान व्यक्तियों को मृत्यु द्वारा अपहृत होते देखते हो और तुम को डर नहीं लगता। तो तुम्हारा हृदय तो वज्र तुल्य है। ततो वैराग्यमापन्नो वत्सराजो भोजं 'क्षमस्व' इत्युक्त्वा प्रणम्य तं च रथे निवेश्य नगराद् बहिर्घने तमसि गृहभा गमय्य भूमिगृहान्तरे निक्षिप्य भोजं ररक्ष। स्वयमेव कृत्रिमविद्याविद्भिः सुकुण्डलं स्फुरद्वक्त्रं निमीलितनेत्रं भोजकुमारमस्तकं कारयित्वा तच्चादाय कनिष्ठो राजभवनं गत्वा राजानं नत्वा प्राह - 'श्रीमन्ता यदादिष्टं तत्साधितम्' इति। तदनंतर वैराग्य को प्राप्त हुए वत्सराज ने 'क्षमा करो - ऐसा भोज से कहा और उसे प्रणाम करके रथ में बैठाया और नगर से बाहर घोर अंधकार में (बने) घर में लेजाकर भूमि के नीचे बने स्थान (तहखाना) में छिपाकर रखा और भोज की रक्षा की। स्वयं ही उसने नकली कृत्रिम वस्तु बनाने की विद्या को जानने वाले लोगों से सुंदर कुंडलों को धारण किये, कांतिपूर्ण मुख से युक्त, बंद आँखों वाले भोज कुमार के मस्तक को बनवाया और उसका छोटा भाई उसे राजमहल में लेजाकर राजा से प्रणाम करके बोला - 'श्रीमन् ने जो आज्ञा दी थी, उसका पालन हो गया।' ततो राजा च पुत्रवधं ज्ञात्वा तमाह - 'वत्सराज, खड्गप्रहारसमये तेन पुत्रेण किमुक्तम्' इति । वत्सस्तत्पत्रमदात्। राजा स्वभाक्षौकरेण दीपमानीय तानि पत्राक्षराणि वाचयति - 'मान्धाता च महीपतिः कृतयुगालङ्कारभूतो गतः सेतुर्येन महोदधौ विरचितः क्वासौ दशास्यान्तकः । अन्ये चापि युधिष्ठिरप्रभृतयो याता दिवं भूपते नैकेनापि समं गता वसुमती मुञ्ज त्वया यास्यति' ॥ ५८ ॥ राजा च तदर्थं ज्ञात्वा शय्यातो भूमौ पपात । तब कुमार का वध हुआ जानकर राजा ने उससे कहा- 'वत्सराज, खड्ग-प्रहार के समय उस पुत्र ने कुछ कहा?' वत्स ने वह पत्र दे दिया।